हिंदी कविता कुछ कह रहा हूँ | Hindi Kavita Kuch Kah Raha Hu

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हिंदी कविता कुछ कह रहा हूँ

हिंदी कविता कुछ कह रहा हूँ

कुछ कह रहा हूँ, दिलरूबा!
तू बातें सुन मेरी  महबूबा!!

सारे अरमान दफन  हो गए हैं!
सारे संबंध दफन हो गए हैं!!

तुमसे संबंध सारे टूट गए!
क्यों तुम मुझसे रूठ गए!!

दिल के पिंजरे में जैसे तू परिन्दा है!
अभी मुझमें तू जिन्दा है!!

रह-रह धीरे – धीरे रक्त में,
तू होती है, स्पदंन मुझमें!

अभी सीने में  धक-धक धड़कती है,
तेरे नाम की धड़कन मुझमें!!

अभी मेरे रग-ऱग में तुम्हारी हुस्न-ए-मोहब्बत जिन्दा है!
अभी तू मेरे साँसों  में अभी तू मुझमें जिन्दा है!!

तू रहती है, हर लम्हा, हर पल दिलबर मुझमें!
मेरे नब्जो में बहती है, तेरी नाम की रूधिर मुझमें!!

अभी मेरे जिस्म में रूह बनकर तू मुझमें जिन्दा!
अभी मेरे दिल के ताजमहल में मुमताज़ बनकर तू मुझमें जिन्दा!!

अभी यादों की बहार बनकर !
अभी सावन की बौछार बनकर!!

अभी तू मेरे ख्यालो में!
अभी तू मेरे ख्वाबो में!!

सुन ख्वाब परी, तू ख्वाबों में जिन्दा है!
मैं तुझमें तू मुझमें जिन्दा  है!!


बिसेन कुमार यादव

यह कविता हमें भेजी है बिसेन कुमार यादव जी ने गाँव-दोन्देकला, रायपुर, छत्तीसगढ़ से।

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