ग़ज़ल रास्ते निकलते हैं और झगड़ा नहीं किया | Hindi Ghazal Raaste Nikalte Hain

आप ग़ज़ल रास्ते निकलते हैं और झगड़ा नहीं किया :-

ग़ज़ल रास्ते निकलते हैं

ग़ज़ल रास्ते निकलते हैं

हुनर के साथ अगर हौसले निकलते हैं
तो ख़ुद-ब-ख़ुद ही नए रास्ते निकलते हैं

ज़ियादा दुख हो अगर आदमी के जीवन में
तो फिर ग़ज़ल में कई काफ़िये निकलते हैं

दरख़्त सूखने वाले हैं पर खुशी है उन्हें
कि नौनिहाल के सब फल पके निकलते हैं

हो अपना काम तो कुछ सूझता नहीं हमको
वगरना माँगे बिना मशवरे निकलते हैं

कि पहले प्यार को कितना भी कोई याद करे
इसी में सबसे अधिक सानिहे निकलते हैं


झगड़ा नहीं किया

चाहत के जैसे साथ में झगड़ा नहीं किया
हमने तुम्हारे हिज़्र को लंबा नही किया

घर के जो मसअले थे वो घर में निपट गये
बाहर किसी भी बात का चर्चा नही किया

सूरज से चाँद जैसे मरासिम बने रहे
हमनें सुनहरी धूप से पर्दा नही किया

हमनें नदी भी पार की तो उसमें डूब कर
मल्लाह,नाव से कभी रस्ता नही किया

ऐसा तुम्हारी याद से रिश्ता सा जुड़ गया
फिर उम्र भर किसी ने भी तन्हा नहीं किया

पढ़िए :- ग़ज़ल भूलने में ज़माने लगे हैं | Ghazal Zamane Lage Hain


रचनाकार का परिचय

ओम अवस्थी

यह ग़ज़लें हमें भेजी हैं ओम अवस्थी जी ने रेवा, मध्य प्रदेश से।

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