मजदूर पर कविता | Mazdoor Par Kavita
मजदूर पर कविता मजदूर के भाग्य का कैसा, विपुल दुर्भाग्य होता है। हजारों बँगले बनाकर स्वयं, फुटपाथ पर सोता है। कमाने चार आने जो, आप पसीने में ही नहाता है, वो ठिठुर-ठिठुर फुटपाथों पर, सारी ही रात रोता है। दाल मखनी और पनीर तो बस सपने में खाता है, हाँ…

