मेरा बचपन पर कविता :- नन्हें से बचपन की ओर | Mera Bachpan Par Kavita

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मेरा बचपन पर कविता

मेरा बचपन पर कविता

चलो तुम्हें ले चलता हूं मैं
नन्हें से बचपन की ओर।
मिलकर जहां सारे बच्चे
जगाते थे मचाकर शोर।।

मां की एक नहीं सुनते थे
हम करते थे अपने मन की।
हंसकर हम प्यारी बोली से
शोभा बढ़ाते थे आंगन की।।

चांद की चलती परछाई को
उत्सुक हो पकड़ने दौड़ते थे।
अपने नन्हें सपनों को नभ में
शशि तारो के बीच छोड़ते थे।।

पेड़ और घरों के कोने में
खेलते थे लुका छिपी छुपकर।
विचित्र मुखौटे लगाकर हम
डराते थे सबको रूप बदलकर।।

हाथ फैलाकर उड़ते थे हम
बनकर नन्ही सी कोई तितली।
सरिता सलिल में तैरकर हमें
प्रतीत होता था बन गए मछली।।

बगीचे के वह रंग बिरंगे प्रसून
व सावन के मनमोहक से झूले।
मित्रो की वह सारी गालियां
और शैतानियां हम नहीं भूले।।

वह दिन भी बड़े निराले थे
था सबके पास समय पर्याप्त।
यौवन ने बदल दिया जीवन
बचपन का जमाना हुआ समाप्त।

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नमस्कार प्रिय मित्रों,

सूरज कुमार

मेरा नाम सूरज कुरैचया है और मैं उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिंहपुरा गांव का रहने वाला एक छोटा सा कवि हूँ। बचपन से ही मुझे कविताएं लिखने का शौक है तथा मैं अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से अपने देश और समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जिससे समाज में मेरी कविताओं के माध्यम से मेरे शब्दों के माध्यम से बदलाव आए।

क्योंकि मेरा मानना है आज तक दुनिया में जितने भी बदलाव आए हैं वह अच्छी सोच तथा विचारों के माध्यम से ही आए हैं अगर हमें कुछ बदलना है तो हमें अपने विचारों को अपने शब्दों को जरूर बदलना होगा तभी हम दुनिया में हो सब कुछ बदल सकते हैं जो बदलना चाहते हैं।

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