हिंदी कविता गुमराह | Hindi Kavita Gumrah
आप पढ़ रहे हैं हिंदी कविता गुमराह :- हिंदी कविता गुमराह हम मनाते रहे बार बार, वो हर बार बिछड़ बैठे। मुझे यकीन था जिसपर, वो हमें ही गुमराह कर बैठे। हम देते रहे राह उसे, वो मेरा ही पथभर्ष्ट कर बैठे। नशे के नाम से दूर रहते हैं हम,…

