जननी पर कविता – प्रेम की अविरल नदी मैं | Janani Par Kavita
आप पढ़ रहे हैं जननी पर कविता " प्रेम की अविरल नदी मैं " जननी पर कविता प्रेम की अविरल नदी मैंतु स्नेह का सागर है माँ,चीर कर दीर्घ लहरों कोमैं तुझमें मिलना चाहता हूँ, अंजुरी में ले शुभ्र कमलऔर पावन शुचित नीर,कर समर्पण खुद को मैंचरणों में उतरना चाहता…

