प्रार्थना कविता – कण-कण में ही तुम्हीं बसे हो | Prarthana Kavita
आप पढ़ रहे हैं प्रार्थना कविता - कण-कण में ही तुम्हीं बसे हो :- प्रार्थना कविता पर्वत घाटी ऋतु वसंत मेंनभ थल जल में दिग्दिगंत मेंभक्ति भाव और अंतर्मन मेंसदा निरंतर आदि अंत में युगों युगों तक तुम्हीं अजेय हो,कण-कण में ही तुम्हीं बसे हो। सृष्टि दृष्टि हर दिव्य गुणों…

