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जात पात पर कविता

जात पात पर कविता

कुछ आराजक तत्वों के कारण ही मिली विषमता है।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

कुतर्कियों के आंगन का संसार सजाया है हमने,
अपने ही आदर्शों को बेकार बताया है हमनें,
जाने अनजाने कुछ पहलू हमें त्रस्त कर देते हैं,
और हमें चाहे अनचाहे व्यर्थ व्यस्त कर देते हैं,

चर्चा परिचर्चा पर छींटाकशी के दौर भी चलते हैं,
तथ्य जोड़कर तर्क सहित कहने के लिए मचलते हैं,
शब्दों का उपयोग प्रसंगों के अनुकूल ही भाता है,
बोल चाल व्यवहार की भाषा का विस्तार बताता है,

अनुमोदन सम्बोधन हो प्रतिवेदन का अभियोजन हो,
कहीं नम्रता कही उग्रता का मिश्रित संयोजन हो,
सत्यमेव जयते के जिद से हममें जुड़ी सुगमता है,
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

स्वर्ग की कोई चाहत हो तो मरने का निश्चय कर लो,
और सदा निष्पक्ष निगाहों से जड़ता का क्षय कर लो,
अंतरिक्ष में इन्द्रधनुष जब सतरंगी सज जाता है,
सप्त रंग में रंग कौन सा नंबर वन कहलाता है,

किसकी होगी अधिक महत्ता कौन निम्न कहलाएगा,
कौन श्रेष्ठता की श्रेणी में सु-शोभित हो पाएगा,
तर्क नहीं कुछ सत्य तथ्य को आत्मसात कर लेने दो,
सबमें समुचित सत्ता का नितान्त भाव भर लेने दो,

सूत से सधकर सुई भी वस्त्रों पे चित्र सजाती है,
और युद्ध में तलवारें सत्ता के सूत्र बताती हैं,
भिन्न भिन्न क्षेत्रों में सबकी अभिन्न सी उद्यमता है।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

मैं तटस्थ हूं टकराकर तूफानों में घिर जाउंगा,
परन्तु ना आदर्शों का मैं अवमूल्यन कर पाऊंगा,
सदा समर्पण के भावों को उन्नत और बनाना है,
छिन्न छिन्न होकर भी जर्रे जर्रे में खो जाना है,

अपने कुल को भी गौरव की अनुभूति करवाऊंगा,
और विश्व में कहीं किसी को तुच्छ नही बतलाऊंगा,
सबका अपना योगदान है सभी राष्ट्र निर्माता हैं,
आलोचक हूं अवगुण का पर सद्गुण पर बिछ जाता हूं,

और सभी को अपवादों का दोष नहीं दे सकता हूं,
और बांटकर सत्ता का जयघोष नही दे सकता हूं,
तन के अंग अंग से पूछो किसमे कितनी ममता है।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है।।

बिखरा सा परिवार कभी सर्वोत्तम ना हो सकता है,
और परस्पर लड़ने से अस्तित्व तलक खो सकता है,
शोषित वंचित नित्य नए संग्राम झेलकर जिन्दा है,
उत्थानों के अभियानों के सभी प्रयास पुलिंदा है,

पर इसका यह अर्थ नही की अन्यों को अभिजात कहो,
और बिना सिर पैर किसी को चुभने वाली बात कहो,
कई उदाहरण दे सकता हूं इतिहासों के पन्नों से,
शोषित होकर भी शोषण के अश्रु बहे ना नैनों से,

भीष्म पितामह वीर व्रती बन आजीवन निर्बाध जिए,
सत्यवती के पुत्रों ने ही सिंहासन को साध लिए,
शोषित की संज्ञा के बिन भी जीवन नही सहमता है ।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

वेद व्यास भी मछवारे थे परन्तु गुरुकुल वाले थे,
और महाभारत ही नही वेदों को भी रच डाले थे,
विदुर पुत्र थे दासी के पर विदुर नीति भी रची गई,
और महामंत्री हस्तिनापुर में कुर्सी रखी गई,

श्रीकृष्ण बलराम स्वयं यादव कुल के आभूषण थे,
परन्तु क्या उनपे भी कोई शोषण वाले दूषण थे,
बाल्मीकि को वर्ण व्यवस्था में हम सभी भुनाते है,
पर कानन में सिया पुत्र लवकुश को वही पढ़ाते हैं,

नन्द वंश के जनक मगध की सत्ता स्वयं संभाले थे,
परन्तु उनके मात पिता भी केश कतरने वाले थे,
लम्बे शासन ऊंचे वैभव में भी जीवन रमता है ।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

स्वतः अहिल्याबाई होलकर चरवाहों घर पलीं बढ़ी,
परंतु ढेरों मंदिर गुरुकुल बनवाने को उमड़ पड़ी,
चर्मकार रविदास गुरु की शिष्या थीं मीराबाई,
जन्म मिला था राजपुताना परंतु गुरु को अपनाई,

मुगल काल से शुरू गंदगी को हम सत्य समझते है,
और समझकर भी नासमझी में ही व्यर्थ उलझते हैं
व्हेनसांग से फाहयान तक कहीं न कोई वर्णन है,
मेगस्थनीज के लेखों में ना जात पात का क्रंदन है,

आज द्रौपदी मुर्मू जी है प्रथम नागरिक भारत की,
सदियों से समृद्ध संस्कृति है विस्तारित भारत की,
समरसता का स्पंदन भारत के मन की समता है ।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

कभी बांटने की ना कोई राजनीति होनी चहिए,
ओछे ध्यानाकर्षण की ना तुच्छ नीति होनी चहिए,
अनेकता में एक सूत्र से जुड़कर हमको रहने दो,
मन में भेद बढ़ाकर मित्रों मुल्क महल ना ढहने दो,

स्वार्थ्य नही परमार्थ के खातिर जीने की आवाज बनो,
और चुनरिया सजती जाए भारत मां के साज बनो,
जात पात के जहर को जिन्दा करना लगता ठीक नही,
सत्य सनातन को शर्मिन्दा करना लगता ठीक नहीं,

इसीलिए मेरे दामन में समरसता का सावन हो,
जाति वर्ण के बिना मनुज के मन का मंदिर पावन हो,
एकजुटता की शक्ति में अंतहीन उत्तमता है।
और हमें भी याद नहीं की हम में कितनी क्षमता है ।।

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रचनाकार  का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव
धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश
स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई
शिक्षा – स्नातक

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