धूप की आत्मकथा कविता :- मैं धूप हूँ | Dhoop Par kavita
धूप की आत्मकथा कविता मैं धूप हूँ, अक्सर परछाईं से डर जाता हूँ, फिर भी परछाइयों के संग गुजर जाता हूँ। क्या होता है कहाँ, सब खबर है मुझको, हर डगर, हर नगर, हर शहर जाता हूँ। दूर तलक जहाँ खुश लोग नज़र आते हैं, वहाँ कुछ देर के लिए…

