धूप की आत्मकथा कविता :- मैं धूप हूँ | Dhoop Par kavita

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धूप की आत्मकथा कविता

धूप की आत्मकथा कविता

मैं धूप हूँ, अक्सर परछाईं से डर जाता हूँ,
फिर भी परछाइयों के संग गुजर जाता हूँ।

क्या होता है कहाँ, सब खबर है मुझको,
हर डगर, हर नगर, हर शहर जाता हूँ।

दूर तलक जहाँ खुश लोग नज़र आते हैं,
वहाँ कुछ देर के लिए मैं ठहर जाता ह।

शाम सवेरे तो मेरी उम्मीद लोग करते हैं,
मौसम कुछ सर्द है, सिर्फ दोपहर जाता हूँ।

छतों पर बैठते हैं वो मेरे लिए इधर उधर,
और मैं हूँ, ना जाने किधर किधर जाता हूँ।

मार्च अप्रैल हो या अगस्त सितम्बर प्यारे,
शरारत छोड़ के कुछ देर सुधर जाता हूँ।

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डा. गुरमीत सिंहडा. गुरमीत सिंह खालसा कालेज, पटियाला ( पंजाब ) से गणित विषय में प्राध्यापक के पद आसीन हैं। आप मर्यादित और संजीदा भाव के धनी होने के साथ-साथ आप गुणीजनों और प्रबुद्धजीवी में से एक हैं। आप अपने जीवन के अति व्यस्ततम समय मे से कुछ वक्त निकाल कर, गीत और सँगीत के शौक के साथ रेख्ता, शेर-ओ-शायरी को अवश्य देते हैं। आपकी गणित विषय पर 25 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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