जोश भरने वाली कविता :- प्रबल इच्छा ने जब ललकारा | Josh Bharne Wali Kavita

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जोश भरने वाली कविता

जोश भरने वाली कविता

प्रबल इच्छा ने जब ललकारा
पिया मैने तब संकल्प का प्याला,
विफल हुआ हूं नहीं मै हारा
आलस को अब जीवन से टाला।

आराम नहीं अब करना है
निरंतर चलते रहना है,
जैसे सरिता सागर से मिलती
वैसे मुझको भी बहना है।

मोतियों को अस्वीकार करके
धारण कर ली परिश्रम की माला,
लक्ष्य पे अंगद सा पैर जमाकर
जग में नही कोई हिलाने वाला।

रोकने वालो तुमसे कहता हूं
बाधायो को जो मेरी राह में डाला,
कठिन मार्ग पर चलकर जीत से
रंग दूंगा सबका मुख काला।

परिवार का बनना मुझे सहारा
मेहनत की धारण करके ज्वाला,
साहस और आत्मविश्वास जैसे
शास्त्रों को बाहर मैंने निकाला।

वृक्षों की झाव लगेगी प्यारी
समस्त सुखों को त्याग कर,
कायर मानव न बनना तू
विकट विपत्तियों से भाग कर।

सपनो को सच करना है तो
पहले खुद को योग्य बना,
सफलता की सुबह नकलेगी
भले आज अंधेरा हो घना।

छात्रों को यह अमूल्य संदेश है
प्रेरणा की जग से न मांगो भीख,
जिसने तुमको है जन्म दिया
सच्ची शिक्षा तू उनसे सीख।

पढ़िए :- चरित्र निर्माण पर कविता “मूल्यांकन”


नमस्कार प्रिय मित्रों,

सूरज कुमार

मेरा नाम सूरज कुरैचया है और मैं उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिंहपुरा गांव का रहने वाला एक छोटा सा कवि हूँ। बचपन से ही मुझे कविताएं लिखने का शौक है तथा मैं अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से अपने देश और समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जिससे समाज में मेरी कविताओं के माध्यम से मेरे शब्दों के माध्यम से बदलाव आए।

क्योंकि मेरा मानना है आज तक दुनिया में जितने भी बदलाव आए हैं वह अच्छी सोच तथा विचारों के माध्यम से ही आए हैं अगर हमें कुछ बदलना है तो हमें अपने विचारों को अपने शब्दों को जरूर बदलना होगा तभी हम दुनिया में हो सब कुछ बदल सकते हैं जो बदलना चाहते हैं।

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