सुबह पर कविता

सुबह पर कविता

प्यारा सा एक दीप जलाकर
आंगन को रोशन कर डाला,
तम के सहचर डर कर भागे
जब लुप्त हुआ अँधेरा काला।

भटके पथिकों को राह मिली
यामिनी ने सिर पे घूंघट डाला,
शांत बच्चों ने किया कोलाहल
क्षण में छाया समक्ष उजाला।

विहंगों को सन्देश सा हुआ
जैसे प्रकृति ने भानु को निकाला,
अभी-अभी तो रात हुई थी
क्षण भर में खुला कैसे ताला।

पुष्प बंद होकर बोल रहे थे
यह दृश्य है मन मोहने वाला,
हिलकर वृक्षों से पत्तों ने टोका
नन्हें दीपों ने जीवन भार संभाला।

भौंरे को लगा बीत गयी रैना
निकलेगा शीघ्र भास्कर मतवाला,
थाम कर जीवन की डोर को
जैसे कोई प्रकृति का रखवाला।

जुगनूँ ने भी किया सहयोग
दृश्य प्रतीत हुआ निराला,
प्यारा सा एक दीप जलाकर
आंगन ने रोशन कर डाला।

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नमस्कार प्रिय मित्रों,

सूरज कुमार

मेरा नाम सूरज कुरैचया है और मैं उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिंहपुरा गांव का रहने वाला एक छोटा सा कवि हूँ। बचपन से ही मुझे कविताएं लिखने का शौक है तथा मैं अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से अपने देश और समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जिससे समाज में मेरी कविताओं के माध्यम से मेरे शब्दों के माध्यम से बदलाव आए।

क्योंकि मेरा मानना है आज तक दुनिया में जितने भी बदलाव आए हैं वह अच्छी सोच तथा विचारों के माध्यम से ही आए हैं अगर हमें कुछ बदलना है तो हमें अपने विचारों को अपने शब्दों को जरूर बदलना होगा तभी हम दुनिया में हो सब कुछ बदल सकते हैं जो बदलना चाहते हैं।

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