ग़ज़ल – भूलने में ज़माने लगे हैं | Ghazal Bhulane Mein Zamane Lage Hain

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ग़ज़ल – भूलने में ज़माने लगे हैं

ग़ज़ल बावरा मन

रक़ीबों से निस्बत बढ़ाने लगे हैं
दिलो-जान उन पर लुटाने लगे हैं

वो फिर से पलटकर क्यूँ याद आए
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं।

रक़ाबत के मारे ये हमजाम याराँ
हमें महफ़िलों से उठाने लगे हैं

न दिन में तसल्ली न शब को ही राहत
माहो-अंजुम से दिल को लगाने लगे हैं

जिन्हें ज़िंदगी में सलीक़ा न आया
हमें रास्ता वो दिखाने लगे हैं

जो ख़ुशियों से लबरेज़ रहते थे हरदम
वो किस्से ग़मों के सुनाने लगे हैं

क़फ़स में जो रखते थे मासूम पंछी
वो उनको हवा में उड़ाने लगे हैं।

ग़ज़ब की वबा है अजब ख़ौफ़ज़द सब
हैं महफ़ूज़ घर ही बताने लगे हैं

जिन्होंने चमन की ये कलियाँ थीं मसलीं
वो सबसे तवस्सुल जताने लगे हैं

शब्दार्थ—
निस्बत--क़रीबी, घनिष्ठता
रक़ाबत--दुश्मनी,बैर
वबा–-महामरी, संस्पर्श से फैलने वाला रोग
तवस्सुल-–लगाव

पढ़िए :- ग़ज़ल ” क़सम दिल से जो खाते हैं “


अंशु विनोद गुप्ता जी अंशु विनोद गुप्ता जी एक गृहणी हैं। बचपन से इन्हें लिखने का शौक है।नृत्य, संगीत चित्रकला और लेखन सहित इन्हें अनेक कलाओं में अभिरुचि है। ये हिंदी में परास्नातक हैं। ये एक जानी-मानी वरिष्ठ कवियित्री और शायरा भी हैं। इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें “गीत पल्लवी “,दूसरी पुस्तक “गीतपल्लवी द्वितीय भाग एक” प्रमुख हैं। जिनमें इनकी लगभग 50 रचनाएँ हैं।

इतना ही नहीं ये निःस्वार्थ भावना से साहित्य की सेवा में लगी हुयी हैं। जिसके तहत ये निःशुल्क साहित्य का ज्ञान सबको बाँट रही हैं। इन्हें भारतीय साहित्य ही नहीं अपितु जापानी साहित्य का भी भरपूर ज्ञान है। जापानी विधायें हाइकु, ताँका, चोका और सेदोका में ये पारंगत हैं।

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