ग़ज़ल – बावरा मन | Ghazal Bawra Man

ग़ज़ल – बावरा मन

ग़ज़ल – बावरा मनपेड़ की फुनगी का तोता बावरा मन।
उन्स में ईश्वर के रोता बावरा मन।

ग़र्ज़ के गहरे समुंदर में नहाकर
हर भरोसा अपना खोता बावरा मन।

ज़ह्र की फ़सलें कभी काटी न जाएं
प्रेम के बीजों को बोता बावरा मन।

दर्द से जोड़ा है नाता इस तरह से
अश्क़ के मोती पिरोता बावरा मन।

अंध कूपों को समझकर अपनी दुनिया
मेंढ़कों-सा ख़ुद का श्रोता बावरा मन।

हँसता कैसे फूल काँटों की चुभन से
काँटों के बिस्तर पे सोता बावरा मन।

इश्क़ में वादा ख़िलाफ़ी उफ़ जुदाई
लाश यादों की है ढोता बावरा मन।

रोज़ सुबहो-शाम सुख-दुख की डगर पर
बाँका-सा सपना सँजोता बावरा मन

ग़ैर को भी मान लेता हम क़रीबी
‘अंशु’ तेरा ही न होता बावरा मन।

पढ़िए :- ग़ज़ल – झूठ की ताज़ा ख़बर अख़बार है


अंशु विनोद गुप्ता जी अंशु विनोद गुप्ता जी एक गृहणी हैं। बचपन से इन्हें लिखने का शौक है।नृत्य, संगीत चित्रकला और लेखन सहित इन्हें अनेक कलाओं में अभिरुचि है। ये हिंदी में परास्नातक हैं। ये एक जानी-मानी वरिष्ठ कवियित्री और शायरा भी हैं। इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें “गीत पल्लवी “,दूसरी पुस्तक “गीतपल्लवी द्वितीय भाग एक” प्रमुख हैं। जिनमें इनकी लगभग 50 रचनाएँ हैं।

इतना ही नहीं ये निःस्वार्थ भावना से साहित्य की सेवा में लगी हुयी हैं। जिसके तहत ये निःशुल्क साहित्य का ज्ञान सबको बाँट रही हैं। इन्हें भारतीय साहित्य ही नहीं अपितु जापानी साहित्य का भी भरपूर ज्ञान है। जापानी विधायें हाइकु, ताँका, चोका और सेदोका में ये पारंगत हैं।

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