बस्ते पर कविता – बहुत भारी बस्ता | Baste Par Kavita
बस्ते पर कविता बस्ते पर कविता शिशु है घर का गुलदस्ता,ढो रहा बहुत भारी बस्ता,खा रहा है स्कूल में पास्ता,जीवन हो गया है खस्ता। पीठ पर है बस्ते का भार,हो रहा अब जीवन भारसबके घर के हैं नौनिहाल,बुरा हो रहा उनका हाल। बच्चे जब स्कूल से आते,चेहरे उनके हैं उड़…

