“इस पवित्र धरा की अनंत महिमा, उसके असीम गौरव और हमारी आत्मा में बसती मातृभूमि के प्रति श्रद्धा को समर्पित आज प्रस्तुत है एक ऐसी रचना, जो न सिर्फ़ शब्दों में, बल्कि भावना में भी भारत की माटी की सुगंध समेटे हुए है। यह कविता है—समर्पण, सम्मान, संस्कार और सनातन संस्कृति की आत्मा का उजाला। आइए, डूब जाते हैं अपनी मातृभूमि पर कविता के उस अनुपम सौंदर्य में…”

मातृभूमि पर कविता

मातृभूमि पर कविता

उगता सूरज तिलक लगाता
उज्जवल चंद्र किरण की वर्षा ,
नतमस्तक हूँ तेरे चरणों में

तेरे चरणों में चारों धाम |
मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ||

तेरी माटी शीतल चंदन ,
जिसमें खेले खुद रघुनन्दन ।
जिसमें कान्हा ने जन्म लिया ,
कभी खाई , कभी लेप किया ।

सीता की मर्यादा यहाँ ,
यहाँ मीरा का प्रेम |
मन के दर्पण का तू दर्शन
तेरे आँचल में संस्कृति का मान।
मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ||

कल कल करती नदियां
अपनी संगीत सुनाए।
चू चू करती चिड़िया
अपनी गीत सुनाए।

मातृभूमि की पावन धरा ,
हर हृदय में प्रेम संजोए
काशी विश्वनाथ की आरती,
हर मन में दीप जलाए |

आध्यात्म की गहराई यहाँ
और विज्ञान की उड़ान |
मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ||

दिव्य अलौकिक अजर अमर
कंकर भी बन जाता यहाँ शंकर |
बलिदानों की गाथा तू ,
तू वीरों की पहचान |

जय-जय माँ भारती,
जय यह पवित्र धरा महान
मातृभूमि ( माँ ) तुझे प्रणाम ||

पढ़िए :- भारत की पवित्र धरा | Holy Soil of India


रचनाकार का परिचय

बाल कृष्ण मिश्रा

यह कविता हमें भेजी है बाल कृष्ण मिश्रा जी ने फ़्लैट नंबर 253, भूतल, श्री कृष्ण अपार्टमेंट, जे-2, सेक्टर 16, रोहिणी, नई दिल्ली से।

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