नैइहर का न्योता

लुगाई कै खरचा, दवाई कै खरचा
लड़िकन के पढ़ाई लिखाई कै खरचा
ऊपर से मंहगाई गटई दबावै
जुतावै बुवावै कै चिंता सतावै
मंहगाई कै मार,सहत जात हउवै
खरचन पर खरचा जोड़त जात हउवैं
खुद से ही बड़बड़ करत बात हउवैं
खरचन पर खरचा जोड़त जात हउवैं
पड़ल हउवै न्यौता घर भर कै बुलउआ
मंगरू कै मलकिन चुवै जैइसै महुआ
चमेलिया कै बप्पा का गहना गढैइबा?
जलालपुर से साड़ी कब हमकै मगइबा?
बचवन कै जूता जुराब लेते अइहा
हौ नइहर कै न्यौता न एकौ भूलइहा,
गदहा जस लादी लदत जात हउवै
मंगरू कै खरचा बढ़त जात हउवै
खुद से ही बड़बड़ करत बात हउवैं
खरचन पर खरचा जोड़त जात हउवैं
मंहगाई कै मार,सहत जात हउवै
चमेलिया कै मम्मी, इंहवा तू आवा
चादर हौव जितना, पांव उतनै फइलावा
सौहर तोहार बात हमरो तू माना
आपन श्रृंगार तू हमही कै जाना
नइहर तोहार न नया रिस्तेदारी
पहिन लेतू काहें न धरूवां कै साड़ी
चलावत बहुत हौ ज़बान जैसे कन्नी
सुनि कै भड़क गै चमेलिया कै मम्मी
मंगरू यह कहिकै पछितात हउवै
मंहगाई कै मार,सहत जात हउवै
खरचन पर खरचा जोड़त जात हउवैं
पड़ल होत न्योता गर तोहरे बहिन कै
सियअउता नया फिर पहुचत्या पहिन कै
सुनावा न हमका बतावा न हमका
गीता नियत पाठ पढ़ावा न हमका
इ ओका सुनावै, उ एका सुनावै,
न इ बात मानै न उ बात मानै
पकड़ि कै पटकली उ मंगरू झोंटा
मंगरू लगावैं लगैं सोंटा सोंटा
टसकले न टसकै मसकले न मसकै
करैं पटकी पटका लड़त जात हउवै
मंगरू यह कहिकै पछितात हउवै
मंहगाई कै मार,सहत जात हउवै
खुद से ही बड़बड़ करत बात हउवैं
झगड़ा खतम भै जुटिन दीदी बहिनिन
हमनेन कै कैइसन अब आइल है दुर्दिन
मंगरूवा कै समझत रहेन बहुतै भोला
मचाइस खूब चर्चा , हैसै टोली टोला
न खाना बनाइउ न ओका बुलाइउ
कही कुछ अबकी तो हमकै बुलाइउ
चिंता में मंगरु,सोंचत जात हउवै
खुद से ही बड़बड़ करत बात हउवैं
खरचन पर खरचा जोड़त जात हउवैं

रचनाकार – रामबृक्ष


रचनाकार का परिचय

रामबृक्ष कुमार

यह कविता हमें भेजी है रामबृक्ष कुमार जी ने अम्बेडकर नगर, उत्तरप्रदेश से।

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