दीपावली पर कविता :- दीप मालाएं जलाकर | Deepawali Par Kavita

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दीपावली पर कविता

दीपावली पर कविता

दीप मालाएं जलाकर,अंधियारा है मिटाना।
रीत जो आती रही है, इस तरह से ही निभाना।
अगर मिट जाते नहीं अंतर्मनों से द्वेष सारे।
व्यर्थ फिर दीपक जलाना,है उचित उनको बुझाना।

क्यूँ जला देते सभी है,एक पुतला शौक में यूँ?
पाक स्वयँ बनें नहीं,फिर रावण जला चौक में क्यूँ?
पाप था जिसके,भरा मन में, वही तो रावण बना।
हैं भटकते रावण बन कुछ मनुज इसी लोक में क्यूँ?

राम सा मर्यादित बनों,दुर्विचारों का हनन हो।
पालन करें सत्यता का, कर्तव्य का निर्वहन हो।
एक पत्नी व्रत निभाकर,राम अनुयायी बने तब,
कलंकित चरित्र न करें,फिर क्यूँ न प्राणों का गमन हो।

दृष्टि भ्रमित करो न खुद की,नारियों की फिर विजय हो।
कठिन होगी राह लेकिन इंद्रियों की फिर विजय हो।
भ्रात हित का मान रखकर स्वार्थ से अनजान होकर।
जनहितों से लोभ त्यागो,दानियों की फिर विजय हो।

पाप का धड़ काटकर,है पाप की जड़ को मिटाना।
ज्ञान का संचार कर फिर,सत्य को ही है जिताना।
राम का नाम पढ़कर,माँ-बाप को गर कष्ट देते।
व्यर्थ फिर दीपक जलाना,है उचित उनको बुझाना।

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मेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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