हवा पर छोटी कविता :- मैं हवा हूँ | Hawa Par Kavita

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हवा पर छोटी कविता

हवा पर छोटी कविता

नदियों से बहते हुए
पहाड़ों को छू कर, झाड़ियों से झगड़ कर
झरनों से सिमटकर।

पक्षियों को आकाश में दौड़ाकर
कुछ कहती है, पास आकर
कानों में फूस-फुसाकर
गालों से टकराकर
कुछ कहती है, सुनो पास आकर
कहती है , मैं हवा हूँ
अलबेली सी चंचल सी।

मैं कह रही हूँ, मैं हवा हूँ
जरा छू कर देखो मुझे
मैं चंचल सी कहीं भी भाग जाउंगी,
महसूस कर लो मुझे
मैं मुसकुराना सिखा जाउंगी।

फिर कहती है, मैं हवा हूँ
मुझे महसूस कर लो,
मैं कुछ खोना नहीं,
कुछ खो कर पाना सिखा जाउंगी।

मैं हवा हूँ करिश्मा हूँ, कुदरत का
छोड़ दी है जिन्होंने जीने की उम्मीद
उनकों जीना फिर से सिखा जाउंगी ।
मैं हवा हूँ, अलबेली सी चंचल सी मैं हवा हूँ।

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रचनाकार का परिचय

बिट्टू कौर

यह कविता हमें भेजी है बिट्टू कौर जी ने खड़गपुर से।

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