हवा पर छोटी कविता :- मैं हवा हूँ | Hawa Par Kavita

आप पढ़ रहे हैं हवा पर छोटी कविता :-

हवा पर छोटी कविता

हवा पर छोटी कविता

नदियों से बहते हुए
पहाड़ों को छू कर, झाड़ियों से झगड़ कर
झरनों से सिमटकर।

पक्षियों को आकाश में दौड़ाकर
कुछ कहती है, पास आकर
कानों में फूस-फुसाकर
गालों से टकराकर
कुछ कहती है, सुनो पास आकर
कहती है , मैं हवा हूँ
अलबेली सी चंचल सी।

मैं कह रही हूँ, मैं हवा हूँ
जरा छू कर देखो मुझे
मैं चंचल सी कहीं भी भाग जाउंगी,
महसूस कर लो मुझे
मैं मुसकुराना सिखा जाउंगी।

फिर कहती है, मैं हवा हूँ
मुझे महसूस कर लो,
मैं कुछ खोना नहीं,
कुछ खो कर पाना सिखा जाउंगी।

मैं हवा हूँ करिश्मा हूँ, कुदरत का
छोड़ दी है जिन्होंने जीने की उम्मीद
उनकों जीना फिर से सिखा जाउंगी ।
मैं हवा हूँ, अलबेली सी चंचल सी मैं हवा हूँ।

पढ़िए :- हिंदी कविता जीवन एक संघर्ष


रचनाकार का परिचय

बिट्टू कौर

यह कविता हमें भेजी है बिट्टू कौर जी ने खड़गपुर से।

“ हवा पर छोटी कविता ” ( Hawa Par Kavita ) के बारे में कृपया अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। जिससे रचनाकार का हौसला और सम्मान बढ़ाया जा सके और हमें उनकी और रचनाएँ पढ़ने का मौका मिले।

यदि आप भी रखते हैं लिखने का हुनर और चाहते हैं कि आपकी रचनाएँ हमारे ब्लॉग के जरिये लोगों तक पहुंचे तो लिख भेजिए अपनी रचनाएँ hindipyala@gmail.com पर या फिर हमारे व्हाट्सएप्प नंबर 9115672434 पर।

हम करेंगे आपकी प्रतिभाओं का सम्मान और देंगे आपको एक नया मंच।

धन्यवाद।

 

 

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on telegram
Telegram
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on email
Email

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *