पिता पर दोहे – माता पिता को समर्पित स्टेटस | Pita Par Dohe

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प्रिय पाठकों माता पर कवितायें तो सब लिखते हैं किन्तु आज हम पिता पर दोहे – पिता को समर्पित स्टेटस पढेंगे, तो आइये पढ़ते हैं –

पिता पर दोहे

 

पिता पर दोहे - पिता को समर्पित स्टेटस

माता से स्नेह मिलता, पिता से अनुशाशन।
दोनों का जब साथ हो, होते तीर्थ दर्शन।।

माँ ममता की खान है, बढ़े पिता से शान।
इज्जत दोनों की करो, तभी मिले सम्मान।।

 निश्छल मन से कर्म कर, रखे सन्तान ख्याल।
सन्तति की ही सोच है, चाहे खुद बेहाल।।

प्रातः काल दफ्तर गया, शाम को लौट के आय।
हमारे लिये क्या क्या सहा, बस आपहुं में छुपाय।।

खुद के लिऐ न कुछ करे, चाहे मिली खरोंच।
लहू-पसीना एक किया, बस परिवार की सोच।।

माता-पिता सा जग में,होत न कोई ईश।
माता अगर लक्ष्मी है,पिता हुवे जगदीश।।

माता से संसार है,पिता पालनहार।
निश्छल सेवा तुम करो,फिर होई उद्धार।।

जीवन कड़ी धूप है,कर्मों की बरसात।
हर कठिन घड़ी सुलझे, पिता रहे जब साथ।

जीवन में जब भी कभी,मैं बेबस हो जाऊँ।
साथ छोड़ देते सभी,पिता को साथ पाऊँ।।

पिता मेरी मजबूती ,पिता ही आधार।
रखना न बैर पिता से,यह जीवन का सार।

पिता से तुझे तन मिला, मिली पिता से शान।
दुःखे न दिल उसका कभी, यह तू मन में ठान।।

पिता आये जगत में, होत रूप भगवान ।
पिता का साथ गर न मिले,फिर काहे की शान।।

पिता ही चार धाम हैं, पिता समस्त तीर्थ।
पिता हमारी रीढ़ है,पिता ही जीवन अर्थ।।

पिता बिना सब सून है,है यह जीवन व्यर्थ।
पिता ने बनाया हमें, इस जीवन में समर्थ।।

पिता ने ही ख्याल रखा,कदम कदम भरपूर।
वही जीवन का स्तंभ है, उससे ही है नूर।

बुढापे में भी पिता का, ख्याल रखना सभी।
जैसे बचपन में तुम्हारा,उसने रखा था कभी।।

बुढापे में पिता भी, बालक सम है होत।
उसके इस रूप में तू, अपना बचपन जोत।।

पढ़िए –पिता की दर्द भरी शायरी | पिता पर दो लाइन शायरी


 

मेहरीश चमोलीरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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1 thought on “पिता पर दोहे – माता पिता को समर्पित स्टेटस | Pita Par Dohe”

  1. Avatar
    संदीप सिंधवाल

    बहुत सुंदर चमोली जी,
    पिता की महिमा पर बहुत ही सराहनीय व्याख्यान किया है आपने। आज की पीढ़ी के लिए यह सीख अत्यंत आवश्यक है।
    थोड़ी त्रुटि मात्राएं ऊपर नीचे हो गईं है, और एक दोहे के विराम पर गुरु आ गया है जो कि सदा लघु होता है।

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