गुरु पर हिंदी कविता – नमन तुम्हें करते हैं | Hindi Poem On Guru

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गुरु चरणों में नमन करते हुए ( Hindi Poem On Guru ) गुरु पर हिंदी कविता :-

गुरु पर हिंदी कविता

गुरु पर हिंदी कविता

गुरु देव श्री चरणों में नमन तुम्हें करते हैं।
शीष नवा स्तुति हम तुम्हें करतें है।

बलिहारी जाऊं प्रति क्षण तुम पर ।
सर्वोच्च मानव धर्म का पाठ तुम पढ़ाते हो।
सुलझे हैं केश, सुंदर उपवन, बब्बर शेर से लगते हो।
हम थे, हम हैं, हम ही रहेंगे, वचन ये बतलाते हो।

उपकार हुए गुरुवर, मुझ तुच्छ प्राणी पर
तुल्लिका धरा पत्र, सिंधु स्याही बना, बखान मैं नहीं कर सकता हूँ।।
नमस्कार कमल चरणो में स्तुति मैं ये करता हूँ।।

तेज प्रताप, मुख मंडल आभा अनन्त, सूरज से लगते हो
दीर्घ हैं चक्षु, मृग नयनों की उपमा, अनुपम।
वंदन हो गुरुवर तुम्हें, शीश झुका प्रणाम हम करते हैं।
धारण हो जब, श्वेत वस्त्र तुम पर ।
वासर में शशि चांदनी से लगते हो।
बलहारि जाऊं, अनन्त, तुम्हें शत-शत नमन मैं करता हूँ।।

प्रियतम हो तुम प्यारे, मधु सरोवर से लगते हो।
चले स्वर्ण धरा पर पग तुम्हारे तो।
उपवन के विराट गरजन सिंह से लगते हो।
अनन्त नमन तुम्हें गुरुवर प्राण प्रिय से लगते हो।।

शक्ति दो तात: हमें चरणों में रहें सदा हम
मानो भुंजग चंदन वृक्ष से लिपटे हों।
प्रणाम हो अंबुज चरणों में ।
शीश नवां स्तुति हम ये करते हैं।।

सिंधु सा, हृदय तुम्हारा, ईर्ष्या न
किसी से करते हो।
कोई भी हो बैरी, कर क्षमा, प्रेम उसी से करते हो।
छत्र, शेष-शैया मंच, आसन से सत्संग जब तुम करते हो।
स्थिर सा समां अनन्त, जगदीश्वर से भी चंचल लगते हो।
मधुर कंठ से कीर्तन जब-तब भी करते हो।
मुरलीधर से भी, श्रेष्टतम से लगते हो।।

शत-शत हो नमन तुम्हे, वंदन तुम्हेें हम करते हैं।
समीर से मुख प्रभा के मधुबन केश सुंदर लहराते हैं।
तब तुम तो मानो, सबसे उत्तम लगते हो।
गुरुवर वंदन हो सरोज श्री चरणों में।
तुम तो हमारे प्रिय गुरुवर, मित्र से लगते हो।।

न्यौछावर हो, ये जन्म प्राणी का तुम पर
सदा ही वंदन ये करते हैं, हो सर्वत्र सुखी-सभी
तुम तो सच में, तारण हारे से लगते हो।
आशीष दो हमें, परिणाम सफल व सुखद होंगे।
वंदन हो, शत-शत पंकज चरणों में।
तुम तो, जगत पिता तुल्य लगते हो।।

मिले संकेत, यदा हमें श्रेष्ट प्रभु से।
विश्व धरा पटल को, श्री पंकज चरणों में नवा देंगे।
दीर्घ नमन हो पुष्प सुंगध चरणों में
स्तुति हम ये करते हैं।
विलीन हो सुप्त समाधि में नाथ मेरे तो।

उत्तम नील कंठ से लगते हो।।
मंचासीन हो, उच्च कमल मंडल पर।
ज्येष्ठ ब्रह्मा से लगते हो।।

प्रणाम हो, मधुबन महक, सुगंध श्री चरणों
नभ, जल, थल, विश्वकर्मा के भी पिता से लगते हो।
प्रणाम सदा है, मधुर श्री पुष्प चरणों में।
तुम तो अनन्त दिनकर के भी स्वामी से लगते हो।।
सच है, ये तुम तो आदि गुरू से लगते हो
वंदन है श्री श्री नीरज चरणों……

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अंकेश धीमानयह कविता हमें भेजी है अंकेश धीमान जी ने बड़ौत रोड़ बुढ़ाना जिला मु.नगर, उत्तर प्रदेश से।

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