कविता चाहता हूं प्यार | Kavita Chahta Hun Pyar

कविता चाहता हूं प्यार – कभी कभी प्यार और उदारता को पूजने वाले लोग लूट लिए जाते हैं, इसलिए आवश्यक है कि प्यार को कमजोर समझने वालों के समक्ष कठोरता भी धारण किया जाए ।।

कविता चाहता हूं प्यार

कविता चाहता हूं प्यार

चाहता हूं प्यार का दीदार का परिवेश हो
चाहता हूं अमन चैन शांति का देश हो
चाहता हूं हर दिलों में प्यार का इजहार हो
चाहता हूं इश्क़ और हुश्न का संसार हो

चाहता हूं झूम के एक गीत ही गाता रहूं
चाहता हूं आसमां तक शीश उठाता रहूं
चाहता हूं पक्षियों सा बैर भाव हो नहीं
चाहता हूं संपदा का भी अभाव हो नहीं

चाहता हूं सावनी की धार का सुरूर हो
चाहता हूं गम मिटे व ना कोई गुरूर हो
चाहता हूं प्रेयसी के चक्षुओं को चूम लूं
प्यार की फुहार पाके भिक्षुओं सा घूम लूं

चाहता हूं केशुओं के बीच में ही जा बसूं
चाहता हूं जुल्फ की इन झालरों में जा फसूं
चाहता हूं गुलबदन की बाजुओं को थाम लूं
चाहता हूं अर्श पे सहर्ष थोड़ा जाम लूं

चाहता हूं गम सितम का ठाव ना ठिकान हो
चाहता हूं हर कोई प्रश्ननता की खान हो
चाहता हूं प्यार के रिश्ते सदा अटूट हों
चाहता हूं हर किसी को बंदिशों से छूट हो

चाहता हूं सब फले फूलें औ तरक्की करें
चाहता हूं जिंदगी में जीत को पक्की करें
चाहता हूं प्रेम के उत्कर्ष का प्रभात हो
चाहता हूं रसभरी रंगीन सारी रात हो

चाहता हूं मर मिटे ये लूटने की चाहतें
हर किसी को हर तरफ से हो हमेशा राहतें
पर मेरा अभिन्न मन्न छिन्न भिन्न हो उठा
जब कोई गरीब डाकुओं के झुण्ड से लुटा

धन धरम औ धैर्य को धता बता, वो चल दिए
जान का जहान से अवशेष भी मसल दिए
औ कह गए कि ध्यान देके कान खोल सुन मेरी
चूं किया तो सीने बीच गोलियां भी गिन मेरी

कब गिरेगी लाश स्वांस सोच भी न आयेगी
अट्टहास हास खास म्लेक्ष को हसाएगी
जब किसी गरीब की दिखी विदिर्ण वेदना
तब किसी गरीब की भी जग गई संवेदना

स्नेह सहानुभूति और संयोग की एक कल्पना
विधि का विधान मान इसका है कोई विकल्प ना
चल पड़ा सम्हल पड़ा मचल पड़ा इस भाव में
चलो अभी तक डाका कहां डाला मेरे गांव में

हो गया सो हो गया ऐसा ना होना चाहिए
छोड़ो, अब कोई बैर के न बीज बोना चाहिए
हम तो हैं बड़े भद्र मन के, कद्र मेरे पास है
मैं जहां तक जानता हूं सब तो मेरे खास हैं

हम अपनी गति मति से उन्नति के पास हों
मंत्र जाप की विधि से पाप ताप नाश हो
नित्य काम काज है यही तो राज काज है
यूं ही ये चलता रहेगा ये ही तो समाज है

पर, एक दिन वो आ गई आफ़त की रूंड झूमकर
पैरों तले धरती भी ज्युं खिसक गई हो घूमकर
बोले हमारे साथ आप ऐसा भला क्यूं कर रहे
हमें ही मार मार के हमारा धन भी धर रहे

नहीं सुनी गई कोई पुकार न कोइ याचना
लूट के चले लुटेरे उनको आई कोई लाज ना
बच गई मेरी चाह में वो आह सी कराह बस
वो भिन्नता की खिन्नता दहक रही थी दाह बस्

मैं स्वयं धिक्कार कि चीत्कार में पड़ा रहा
दुर्दशा को देख के ज्यूं शर्म से गड़ा रहा
मिटा दिया उन चाहतों को जो मेरी अपनी रही
वो प्रेम काम अर्थ स्वार्थ जो मुझसे बनी रही

हर चाहतों ने चाह चाह राह एक वो चुनीं
दे सुरक्षा देश को, कर डाकुओं से दुश्मनी
ग्रीवा मरोड़ तोड़ की वो चाह राह चल पड़ी
नेवले से यूं डरी भूजंगनी निकल पड़ी

इसीलिए मैं चाहता हूं प्यार में निखार हो
फूल सी महक रखो तो शूल सा हथियार हो
अब हमारी चाहतों के पंख प्राणवान हों
मैं बनूं जो राम सा तो संग में हनुमान हों

अब हमारी चाहतों में राष्ट्र प्रेम चाहिए
अब अनेक एक हो वो कुशलक्षेम चाहिए
अब हमारी चाहतों में सूर्य का प्रताप हो
देश ना रुदन करें ना दर्द से विलाप हो

अनुरोध है इन चाहतों को आप भी संजोइए
समस्त जाति पंथ को एक सूत्र में पिरोइये
व्यक्ति में समाज में व राष्ट्र में हो चाहतें
चले चलो चले चलो इस चाह को नीबाहते

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रचनाकार का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव

धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश

स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई

शिक्षा – स्नातक

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