बदलाव के लिए प्रेरित करती कविता :- आगे बढ़कर लड़ना होगा

बदलाव के लिए प्रेरित करती कविता ” आगे बढ़कर लड़ना होगा ” :-

बदलाव के लिए प्रेरित करती कविता

बदलाव के लिए प्रेरित करती कविता

चुनौतियों को छिन्न भिन्न कर,
उर्ध्व शिखर पर चढ़ना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

शत्रु नित्य ललकार रहा हो,
सिर पे जूते मार रहा हो,
देश धर्म को आतंकित कर,
विषधर बन फुफकार रहा हो,
मृदु मानवता का भक्षण कर,
स्नेह चुनरिया फार रहा हो,
माता मही की प्यारी छवि को
कालिख पोत बिगाड़ रहा हो,
और देश के वीरव्रती,
संकल्पों को संहार रहा हो,
तो हमको कुछ करना होगा,
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

आतंको की कायरता से,
कुटिल नीति की धूर्त प्रथा से,
नित्य अधोगति दुहराता हो,
खल दल बल विष बाऊरता से,
केशर कुंज कलुष्कृत करता,
जिहादी आतुरता से,
द्वेष भाव के दाव दिखाता,
बैर दिखाता तत्परता से,
नए निमंत्रण पत्र भेजता,
बांह बढ़ाता कट्टरता से,
तो अरि बांह कतरना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा

जहां तिरस्कृत हो अभिलाषा,
डरकर कुंठित होती आशा,
हमने मां का मस्तक माना,
सत्कर्मों से नित्य तराशा,
उसी भूमि पे उत्पाती बन
दानव करते खूब तमाशा,
जन्नत के जुनून में जल जल,
नौज्वानों को देते झांसा,
पाप कर्म के षडयंत्रों में,
होता रहता रोज खुलासा,
सोच समझ पग धरना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

धर्म भूल जो बने विधर्मी,
कर्म भूल जो बने कुकर्मी,
अतांकवाद परस्त ग्रस्त हों,
आतंको के वो सहकर्मी,
हर मोर्चो पर घिरे हुए हों,
फिर भी छोड़े नहीं बेशर्मी,
जो आस्तीन में सांप लिए हो,
उनके साथ ना बरतो नरमी,
सूर्य हूताशन को दहका के,
दुष्टों को दिखला दो गर्मी,
बज्र प्रहार अब करना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

हम हमीद को प्यार करेंगे,
हम कलाम स्वीकार करेंगे,
अशफ़ाक उल्ला की फांसी पे,
क्रांति कुंड तैयार करेंगे,
बिस्मिल्ला की शहनाई में,
सात सुरों का सार भरेंगे,
जयचंदों को धूल चटाने,
समरभूमि हूंकार भरेंगे,
पर अफजल घर में लाओगे,
तो फांसी हर बार करेंगे,
अब राष्ट्र द्रोह से डरना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

सहनशीलता हमें सुहाती,
कोकिल प्रीत रीत में गाती,
कुंज कली में कुसुम महकता,
और मधुर गुंजन मदमाती,
आनंदित उपवन की गरिमा,
की मर्यादा हमको भाती,
पर जब कोई करे कोलाहल,
तो मेरी भौंहें तन जाती,
कौन करे बर्दाश्त खलों को,
गर कुल को लूटें कुलघाती,
नित्य चौकशी करना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

उज्ज्वल पथ पर ज्योत जलाएं,
मातृभूमि का दंश मिटाएं,
जननी की सतरंगी चूनर,
एकसूत्र में उसे पिन्हाएं,
सहनशीलता के संरक्षक,
हर बाधा को दूर भगाएं,
सुख दुख में संवाद करे हम,
और मधुर व्यवहार निभाएं,
राष्ट्रहितों के बने सारथी,
और सभी भ्रम भेद नशाएं,
सब में भाव ये भरना होगा
आगे बढ़कर लड़ना होगा ।।

पढ़िए :- प्रेरणादायक कविता भय का मुखौटा उतार


रचनाकार  का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव

धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश

स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई
शिक्षा – स्नातक

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