भीष्म पितामह की कविता :- कहो धर्म से युद्ध लड़ूं

भीष्म पितामह की कविता :- महाभारत आरंभ होने से पहले भीष्म पितामह वर्तमान भूत और भविष्य के दृश्य का आकलन करते हुए गहन विचार मंथन कर रहे हैं कि वे किस ओर से युद्ध लड़ें। वो धर्म का साथ निभाएं या अधर्म का। किसका युद्ध जीतना ज्यादा आवश्यक है, किसके जीतने से धर्म की विजय होगी।

भीष्म पितामह की कविता

भीष्म पितामह की कविता

कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या, इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।
किंकर्तव्यविमूढ़ भीष्म है, कहो प्रथम किसको अपनाऊं ।।
कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या, इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।

प्रथम धर्म है दृढ़ प्रतिज्ञ व्रत, और राष्ट्र में धर्म आचरण,
निज मस्तक पर कलंक धर के, वीर ब्रती बन पालूं प्रण,

मुझे मोहती हस्तिनापुर, की रक्षा का वचन महान,
राजधर्म की रीत प्रीत में, भरतवंश का रक्खूं मान,

हठी बनूं औ इतिहासों में मैं खुद को बौना कर जाऊं ।।
कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।

राजन की अज्ञाओं के, अनुपालन में हूं बंधा हुआ,
सिंहासन से अनुशासन के, परिचालन में सधा हुआ,

किन धर्मो को धारण करूं, की धर्म ध्वजा पाए पहचान,
किन अभियोजन में जीने का, करूं प्रयोजन हे भगवान,

आज सत्य कि शिथिल श्रृष्टि में क्या क्या खोऊं क्या क्या पाऊं ।।
कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या, इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।

प्राण जाए पर वचन न जाए, भरतवंश का मूल्य महान,
त्याग की आग में आहुति देकर, राजाज्ञा को दूं सम्मान,

विवश दशा है त्रस्त रहूं या, ध्वस्त करूं निज आत्माभिमान,
ज्ञान चक्षु के अवलोकन से, भविष्य दृश्य है लहुलुहान,

इतिहासों के स्वर्ण पटल पे, कौन चित्र अंकित कर जाऊं ।।
कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या, इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।

इंद्रप्रस्थ की नियति में ही, निष्ठुर कलंक आच्छादित है,
अविवेक अज्ञान अंध सब, मोह पाश प्रतिपादित है,

सभ्य अंश विध्वंश हुए हैं, ईर्ष्या मोह प्रभावी हैं,
नेक विवेक अनेक मिटे, अब तो विनाश संभावी है,

मेरी तो ना सुनी जा रही किसकी सुनूं या किसे सुनाऊं ।।
कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या, इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।

सभी प्रश्न हल हो पाते हैं, क्या युद्धों में लेकर जान,
क्या फिर फिर से नहीं सजेगा, कुरुक्षेत्र का रण मैदान,

क्या विधवाएं फिर विलाप, ना करेंगी खोके प्रिय का प्राण,
कन्याओं का चिर हरण कर, क्या फिर ना होगा अपमान,

तो फिर धर्म को विजय दिलाने चलो अधर्म का अंश मिटाऊं ।।
कहो धर्म से युद्ध लड़ूं या, इस अधर्म का साथ निभाऊं ।।

पढ़िए :- त्याग पर कविता “छल द्वेष दंभ त्याग कर”


रचनाकार  का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव

धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश

स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई
शिक्षा – स्नातक

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