आतंक पर कविता :- आतंक की कायर सेना को मारो

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आतंक किसी एक चीज का नाम नहीं है। रोज मर्रा के जीवन में कई ऐसी घटनाएं होती हैं जो आतंक के बराबर होती हैं। जिनसे मुक्ति की बात इस कविता में कवि कर रहे हैं। क्या हैं वो सब आइये पढ़ते हैं आतंक पर कविता ” आतंक की कायर सेना को मारो ” में :-

आतंक पर कविता

आतंक पर कविता

मचा है घमासान भारत के अंदर,
अरि दल की सेना दमन को खड़ी है !
सीधी लड़ाई को मौका नहीं है,
उन्हें छद्म युद्धों की आदत पड़ी है !
जुल्मों सितम में सिसकती है घाटी,
उठो पार्थ भारत का वैभव संवारों !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

चरमपंथियों से वतन जल रहा है,
कलुषकार होता चमन जल रहा है !
वतन के पुजारी जगो या जगाओ,
मां भारती का भवन जल रहा है !
संयम की सीमा को दर्पण दिखादो,
सिर पे चढ़े हैं जो उनको उतारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

कोलाहल मचा के रखा है वतन में,
हमें ही चिढ़ाते हमारी जतन में !
दिल्ली के दरबार देरी करो ना,
हमारी भलाई है उनके पतन में !
घातक बनें हैं जो माता महि के,
उन्हें घायल करने का निर्णय स्वीकारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

फूलों की घाटी को मेहकना को होगा,
धरम की धीरजता को बतलाना होगा !
चेतावनी की जरुरत नहीं है,
उन्हें उनकी भाषा में समझाना होगा !
शांति के हित में है क्रांति जरूरी,
जरूरी को कोई वजह से न टारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

दुश्मन हमारा करम भूल बैठा,
युद्धों का नियम धरम भूल बैठा !
कब तक सहें उनकी गुस्ताखियों को,
गद्दार है जो शरम भूल बैठा !
हिंसक आयुधों की हिंसा मिटा दो,
हिंसा का प्रतिउत्तर हिंसक संहारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

कब तक ये धरती लहू में सनेगी,
शहीदों की कब तक चिताएं जलेगी !
माता के मन का रुदन कब रुकेगा,
कब तक सुहागन अभागन बनेगी !
ए मेहँदी महावर भी कब तक धुलेगा,
सहनशीलता को अब फूंकों पवारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

मम्मी के आँचल का प्यारा सा गहना,
कब तक सुनें हाथ बांधे ही रहना !
आँखों का तारा, जो कुल का सहरा,
उसे छटपटाहट को कब तक है सहना !
ए घर का दुलारा जो हमने दिया है,
उसे अपनी कायरता में ना निहारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

समस्या जटिल है तो डर के ना भागो,
दुश्मन के सीने पे गोली तो दागो !
मध्यस्थता की जरुरत नहीं है,
अपनी भी शक्ति का संबल दिखा दो !
बता दो उन्हें अब संभल ना सकोगे,
उन्हें तीखे शब्दों में डट के तिखारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

कातिल कुटिल भेड़िये जो बनें हैं,
खुनों में नाख़ून जिनके सनें हैं !
भला उनसे क्या है तसव्वुर हमारा,
क्यों हम उन्हें माफियों में चुनें हैं !
सर्पों के बंधन में चन्दन बिलखता,
बिलखते हुए चोट सहता हजारों !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

कब तक करें गर्दिशों में गुज़ारिश,
कब तक सहें पथ्थरों की हम बारिश !
खिलता नहीं क्यूँ अमन का गुलिस्तां,
सेना का उत्साह होता लावारिस !
कीचड़ से केशर की क्यारी है कलुषित,
कुकर्मियों की कलुषता पखारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

कोई माँ के दामन को ही नोचता है,
दुश्मन से मिलकर वतन बेचता है !
हमारा प्रजातंत्र लाचार होकर,
डांटे या मारें यही सोचता है !
नहीं संतुलन है सियासत के रण में,
सियासी दलों को सिरे से नकारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

हमारे सजग संतरी आप जागो,
हमारी ही सेना को निर्णय सुना दो !
सेना सहज ही निपट लेगी उनसे,
खुली पांचजन्य की मुनादी बजादो !
नासूर को जड़ से कटेगी सेना,
सेना की आवाज को तो ललकारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

डर डर के ना जीना जीने के नाते,
अच्छा है मर के अमर तो हो जाते !
सवा सौ करोड़ों की आवाज हो तुम,
इज़राइल से गर जरा सीख जाते !
अभी अपने पौरुष पे करलो प्रतिज्ञा,
दुश्मन की हस्ती समष्टि उजारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

हम उनको सारी ब्यवस्था दिए हैं,
खानों के दानें भी सस्ता दिए हैं !
हमारे जवां उनकी रक्षा में हाज़िर,
औ, वो हमें ही मिटाने का रास्ता किए हैं !
ए कैसा ब्यवहार है एक घर में,
ऐसी विषमता से हमको उबारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

हमनें जिन्हें अपना सर्वस्व माना,
बहुमत की गिनती से सर्वोत्तम जाना !
उम्मीद थी जिनसे दृढ निश्चयों की,
समझें हम क्या, ए है खोना या पाना !
विश्वास की आस अब भी वही है,
करके दिखा दो – या ना कह के डकारों !
अलगाव के आचरण को मिटा दो,
आतंक की कायर सेना को मारो !!

भला किसको विकास की ना पड़ीं है,
महाशक्तियां भी इसी पे अड़ीं है !
आप एक मुद्दे पे मन तो बनाओ,
कश्मीर से जो समस्या जुडी है !
अब आर या पार का युद्ध करके
गत सत्तर सालों का संकट निवारो !
अलगाव के आचरण को मिटा दो
आतंक की कायर सेना को मारो !!

पढ़िए :- राष्ट्र प्रेम पर कविता | राष्ट्र निर्मिति ध्येय हमारा


रचनाकार  का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव

धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश

स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई

शिक्षा – स्नातक

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