कविता प्रेयसी का सौंदर्य वर्णन :- यूं चेहरे से मुसकाई हो

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कविता प्रेयसी का सौंदर्य वर्णन

कविता प्रेयसी का सौंदर्य वर्णन

यूं चेहरे से मुसकाई हो,
ज्यूं ईश्वर की परछाई हो।

नैनन देखा मन बहक गया,
किस्मत पर अपने ठिठक गया।

तुम फूल खिली फूलवारी हो,
या यौवन की बलिहारी हो।

तुम लगे प्रेम की मूरत हो,
खूबसूरत से खूबसूरत हो।

हूरों का जलवा धूमिल हो,
तुम सुंदरता में शामिल हो।

आशिकों के मन की पूजा हो,
मधु गान अधर पे गूंजा हो।

है शब्द नहीं कुछ कह पाऊं,
कुछ परिभाषा न गढ़ पाऊं।

चंचल मन की अभिलाषा हो,
मधुकर मकरंद का प्यासा हो।

सुख संवर्धन हो उपवन की,
मधु हास महकते यौवन की।

मन तड़प रहा उत्पीड़न में,
जियेें ख्वाबों के जीवन में।

तुम्हे देख ये नयना धन्य हुए,
आनंद अंकुरित पुण्य हुए।

एक बार तो मेरे संग आओ,
सौन्दर्य से जीवन रंग जाओ।

हे चंद्रमुखी हे मृगनयनी,
हे हूर परी हे मन रमणी।

तुम मिल जाओ मैं जी जाऊं,
जी जी के सुधारस पी जाऊं।

यह चांद भी तुमसे मद्धम है,
उसकी भी चमक मानो कम है।

चेहरे पे आभा चमक रही,
नैनों में दुति सी दमक रही।

तुम पवित्रता से पोषित हो,
बिन आभूषण आभूषित हो।

जैसे बासंती मौसम हो,
अल्हड़ मस्ती का संगम हो।

तुम महक रही हो सांसों में,
उन्मुक्त मरूत उन्चासो में।

मन मांग रहा है प्यार प्रिए,
दे दे मुझको अधिकार प्रिए।

तूं कह दे जो मैं कर जाऊं,
तेरे मन में घर कर जाऊं।

इस चाहत का सम्मान तो कर,
तूं कदम बढ़ा पहचान तो कर।

यह दौर दीवाने पन का है,
सुख सम्मोहित उलझन का है।

इस दौर में आ तूं साथ निभा,
मौजों में भर दे मस्त प्रभा।

उपमा ही नहीं जो बतलाऊं,
तुम मिलो तो मै भी इठलाऊं।

होठों पे सूर्य किरण चमकी,
तुम प्रीत बनो इस प्रीतम की।

मन आतुर है अपनाने को,
आकर्षण में खो जाने को।

जैसे भी हो जी लूंगा मैं,
दुख को भी सुख कह लूंगा में।

इंगित कर दो इजहार करूं,
हर लम्हे को स्वीकार करूं।

है पराकाष्ठा चाहत की,
उम्मीद दिखा दे राहत की।

ऊर्जा उमंग उमगाती है,
श्रृष्टि के चक्र चलाती है।

शशि सूर्य धरा के लश्कर में,
सब घूम रहे हैं चक्कर में।

तुम श्रोत हो मुझमें मुहब्बत की,
मेरे इश्क ने हुस्न की इज्जत की।

अब अपनी मुहब्बत पारित कर,
ना इसे सिरे से खारिच कर।

तुमसे ही मुहब्बत सजती है,
संगीत में सरगम बजती है।

अपना लूं मैं तेरा हर गम,
मैं खो जाऊं तुझमें हरदम।

मैं तेरा हर विश्वास बनूं,
तेरे धड़कन की सांस बनूं।

खुशियों का पल जो मिल जाए,
उसको जी भर जी लेने दो ।
कुछ गम सह के हस लेने दो,
कुछ हस हस के पी लेने दो ।।

जीवन क्षण भंगुर सपना है,
भला कौन यहां पे अपना है ।
उम्मीदों पर संसार चला,
हमको भी यहीं पे खपना है ।।

धरती चलती सूरज चलता ,
ब्रम्हांड भी है गतिमान यहां ।
हम गम में तम में ना ठिठके ,
बस रंखे खुशी में प्राण यहां ।।

यह कालखंड ना आएगा,
ना पुनः पुनः दुहराएगा  ।
हम भी तो सृजन हैं श्रृष्टि के,
जो आया है ओ जाएगा ।।

फिर क्यूं गम में हम कोपित हों,
क्यूं कालिख से आरोपित हों ।
जो मन चाहा ओ कर जाए,
मन पुलकित और प्रमोदित हो ।।

चाहत की चाह मुहब्बत है,
इसका पैग़ाम श्रवण कर ले ।
मन मस्त मगन सावन मांगे,
प्रीतम के कष्ट हरण कर ले ।।

तूं सोच वो कितना प्यारा है,
जिसने की तुझे संवारा है ।
जो खुशियों का संचालक है,
तुझपे सब खुशियां वारा है ।।

मधु रूप अनूप पुहुप कली,
मन से मन में बस जा तू प्रिए ।
संताप का ताप मिटा प्रतिपल,
पट घूंघट का उचका तू प्रिए ।।

खुशियों का अब मुकाम तो दे ,
तूं अमिय मूर्त का धाम तो दे ।
संग्राम मिटा इस तड़पन का,
आलिंगन का परिणाम तो दे ।।

आराम तो दे आराम तो दे,
चंचल मन को विश्राम तो दे ।
तुम पूजा और प्रसाद भी दे,
ढाई अक्षर का नाम तो दे ।।

बस हां कह के स्वीकार तो कर ,
पलकों पे उठा के बिठा लूं अभी ।
दिल हारे को दीदार तो कर ,
दुख दर्द सभी निपटा लूं अभी ।।

संदेह न कर  तूं स्नेह तो कर,
दो जिस्म मिटा एक जान तो कर ।
पावन परिणय का संधि मिलन,
नव जीवन का उत्थान तो कर ।


रचनाकार  का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव

धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश

स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई

शिक्षा – स्नातक

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