मजदूर दिवस पर कविता :- कहते है मजदूर | Majdoor Kavita

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मजदूर दिवस पर कविता

मजदूर दिवस पर कविता

प्रगति का आधार हूं मैं
मुझको सब कहते है मजदूर,
अमीरों की खड़ी करता इमारत
अपने परिवार से रहकर दूर।

कंधों पे उठाता देश का भार
हंसते हंसते ईंटो को उठाकर,
सुंदर महलों का करता निर्माण
अपनी व्यथाओ को भुलाकर।

सूरज की अति तीव्र धूप में
करता खून पसीना एक,
कभी नही शिकायत करता
चुपचाप सहता दुख अनेक।

मौसम की नही करता परवाह
अंधेरी रात हो या हो बरसात,
महल,इमारतों को चमका करके
धूल में मैला करता अपना गात।

मेहनत करके जब फल पाता
ह्रदय मेरा प्रफुल्लित हो जाता,
दुख अत्यंत प्रतीत होता तब
जब विपत्ति में न कोई काम आता।

निरंतर करते परिश्रम अपार
पर नही कभी हम करते गुरूर,
करते हम भी साहब का काम
पर अज्ञान के कारण है मजबूर।

थकान हमें भी करती परेशान
लेकिन एक पल न करते आराम,
कोई भी कार्य नही होता छोटा
महत्वपूर्ण होता हर एक काम।

मेरी छोटी सी यही कहानी है
समझो तुम सब इसको जरूर,
प्रगति का आधार हूं मैं
मुझको सब कहते है मजदूर।

पढ़िए :- मजदूर पर कविता “मजदूर के भाग्य का कैसा”


नमस्कार प्रिय मित्रों,

सूरज कुमार

मेरा नाम सूरज कुरैचया है और मैं उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिंहपुरा गांव का रहने वाला एक छोटा सा कवि हूँ। बचपन से ही मुझे कविताएं लिखने का शौक है तथा मैं अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से अपने देश और समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जिससे समाज में मेरी कविताओं के माध्यम से मेरे शब्दों के माध्यम से बदलाव आए।

क्योंकि मेरा मानना है आज तक दुनिया में जितने भी बदलाव आए हैं वह अच्छी सोच तथा विचारों के माध्यम से ही आए हैं अगर हमें कुछ बदलना है तो हमें अपने विचारों को अपने शब्दों को जरूर बदलना होगा तभी हम दुनिया में हो सब कुछ बदल सकते हैं जो बदलना चाहते हैं।

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