Mrityu Par Kavita – जीवन की वास्तविकता और जीवन की बाद की वास्तविकता को दर्शाती हुई प्रवीण जी की ” मृत्यु पर कविता “

मृत्यु पर कविता

मृत्यु पर कविता

प्राण परिंदा एक समान
जिसको इक दिन उड़ जाना है।
तुमने जो कर्म किये है जग में
बस उनका ही ताना-बाना है।।

पाप और पुण्यों का थैला
साथ तेरे ही जायेगा,
जग में हंसने रोने वालों को
तु कभी देख ना पायेगा,
कोई अच्छा माने तुझको
कोई बुरा बतलायेगा,
कर्मो का है खेल निराला
धन मान यही खजाना है।।

प्राण परिंदा एक समान
जिसको इक दिन उड़ जाना है।

पत्थर को क्यों पूज रहा है
क्यूँ बन बैठा तु अनजान,
मात-पिता के त्याग को
आज भूल रही सन्तान,
बस कर अब संभल जा बंदे
गर नाम अपना कमाना है,
क्षण भंगुर है जिंदगी
भवपार इसे लगाना है।।

प्राण परिंदा एक समान
जिसको इक दिन उड़ जाना है।

कदम कदम पर ज़िंदगी
उलझी हुई इक किताब है,
आदि- अन्त का आज तक
सुलझा नहीं कहीं जवाब है,
समय के चक्षु को देखो तुम
शुष्क फिसलता ख़्वाब है,
प्रतिपल घटता नीर यहाँ
प्रतिपल साँसों को बचाना है।।

प्राण परिंदा एक समान
जिसको इक दिन उड़ जाना है।

संयम से कसते जाओ तुम
अपनी वाणी के तार यहाँ,
अपनों के बिगडे़ बोल ही
मन पर करे प्रहार यहाँ,
अंतर घट को छू गए
अनुरोधों के ज्वार यहाँ,
झूठी झंकारों की खनको से
ढ़हती गरीमाओं को बचाना है।।

प्राण परिंदा एक समान
जिसको इक दिन उड़ जाना है।

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