पन्ना धाय और पुत्र चंदन | Panna Dhai Aur Putra Chandan

पन्ना धाय और पुत्र चंदन – इतिहास में अमर है मेवाड़ के कुंवर उदय प्रताप ( महाराणा प्रताप )और पन्ना धाय की कहानी, मगर पन्ना के पुत्र चंदन की वेदना कोई न पढ़ सका। आप पढ़िए सरिता गर्ग ‘सरि’ जी की कलम से लिखी पन्ना पुत्र चंदन की कहानी और उसकी माँ का उदबोधन-

पन्ना धाय और पुत्र चंदन

पन्ना धाय और पुत्र चंदन

मैं वो नन्हा बालक हूँ माँ!, जिसको तूने जन्म दिया था।
पर मेवाड़ राज्य की खातिर, मुझको ही कुर्बान किया था।।

पालन पोषण किया उदय का, तूने उसका उदर भरा था।
मेरे हक का दूध पिलाया, मन ने मेरे गदर करा था ।।

हत्या कर बनवीर ,भूप की, कुंवर हेतु वध करने आया।
रक्त सनी तलवारें लेकर, खौफ महल में भरने आया।।

कुंवर उदय की जान बचाने, उसी सेज पर मुझे सुलाया ।
तेरी मेधा ने खुद जग कर, शायद उस पल तुझे सुलाया।।

जना कोख से तूने अपनी, क्यों मेरा तन अध करवाया।
राजपुत्र को किया सुरक्षित, और मेरा खुद वध करवाया।।

चीख न पाई उस पल माँ तू, नहीं आँख ने नीर बहाया।
गिरे रक्त के छींटे तुझ पर, नहीं हृदय ने धीर बहाया।।

स्वामिभक्ति अरु त्याग-तपस्या, जग में तेरा नाम करेगी।
कटी हुई गर्दन आँखों में, नर्तन सुबहो-शाम करेगी।।

राणा के जीवन की गाथा, जग में जब गाई जाएगी
कुंवर उदय को धरे गोद में, पन्ना तब पाई जाएगी।।

नाम न लेगा मेरा कोई, ना ही कोई याद करेगा ।
निःअपराध गया जो मारा, किससे वो फरियाद करेगा।।

शिलालेख पर लिखी रहेगी, हे माँ तेरी अमर कहानी।
खुश हो लूँगा, लिख दे कोई, चंदन की भी अगर कहानी।।

पुत्र के प्रति माँ का उदबोधन –

था कर्तव्य यही तब सम्मुख, नहीं विमुख मैं हो सकती थी।
स्वामी को सर्वस्व समर्पित, अवसर कैसे खो सकती थी।।

तेरी माँ भी थी क्षत्राणी, कालचक्र मुख मोड़ रहा था।
जाने कैसे मन भी मेरा, ममता तेरी छोड़ रहा था।।

पुत्र कोख से तुझे जना था, प्राणों से भी तू प्यारा था।
पर मेवाड़ राज्य की खातिर, उस पल मैने सुत हारा था।।

कितना मेरा मन रोया था, जख्म मेरे दिल ने खाए थे
गिरे खून के छींटे दिल पर, अश्क मगर ना बह पाए थे ।।

तनय माफ कर देना मुझको, समझो मेरी लाचारी थी।
वचनबद्ध थी मैं  स्वामी से, यह करनी मुझ पर भारी थी।।

उदय सिंह की जान बचाई, दुनिया नहीं भुला पाएगी।
पर तेरी माँ इन बाँहों में, तुझको नहीं झुला पाएगी।।

पढ़िए :- महाराणा प्रताप पर कविता | Maharana Pratap Poem In Hindi


रचनाकार का परिचय

सरिता गर्ग 'सरि'

यह कविता हमें भेजी है सरिता गर्ग ‘सरि’ जी ने ग्राम माचवा, राम कुटिया के पास, कालवाड़ रोड, जयपुर  (राजस्थान)  से।

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