सामाजिक कविता -अब न चलाओ ख़ंजर

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प्रिय पाठकों , आज आप सबके सम्मुख प्रस्तुत है एक सामाजिक कविता जो आज के हालातों को बताती है की किस तरह हमारे ही देश के अन्दर रहकर वह सामाजिक सौहार्द को खराब कर रहे हैं , जैसे कश्मीर घाटी में वहीं के के कुछ नौजवान जो पथ से भटक गए हैं और अब सेना पर पत्थर बाजी करते हैं , उसी तरह कुछ समय पहले जे. एन. यू. में जिस तरह भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे देशद्रोही नारे लग रहे थे इस तरह के नारों को सुनने के बाद मन क्रोध से भर जाता है, तो इस कविता में कुछ इस तरह के भटके हुवे लोगों से प्रार्थना की गयी है , तो आइये पढ़ते हैं –

सामाजिक कविता -अब न चलाओ ख़ंजर
सामाजिक कविता

ज़हर घोलते फ़िज़ाओं में
हुक्म मानते आकाओं के
जन्नत को क्या कर दिया
भेष बदल कर कहर किया।

अब न चलाओ ख़ंजर
भयावह है ये देखो मंजर
शांति की अब बात करो
न महलों को करो खंड्हर ।

बसुंधरा भी सब देख रही
कितने संताप झेल रही
मानवता को जगाओ तुम
क्रूर दानव को भगाओ तुम।

कुछ घाव भरते नहीं हैं
अंतर्मन से निकलते नहीं हैं
संस्कृति को बचाओ तुम
विश्व में शांति बनाओ तुम।

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मेरा परिचय

नाम. : कामिनी गुप्ता

पिता : श्री सुभाष चन्द्र गुप्ता

जन्म स्थान. : जम्मू(जम्मू कश्मीर)

जन्म तिथि : 18:02:1978

शिक्षा : एम. एस.सी.(गणित)

विशेष. : पांच साँझा संग्रह में
प्रकाशित रचनाएं  तथा  विभिन्न अखबारों में प्रकाशित रचनाऐं
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