पद्य कथा दो ठग :- बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कविता | Shikshaprad Padya Katha Do Thug

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पद्य कथा दो ठग एक लोककथा का पद्य रूपांतरण है इस कथा में दो ठग एक दूसरे को ठगने के फेर में खुद ही ठगी के शिकार हो जाते हैं। इस पद्य कथा में बच्चों को कहानी के माध्यम से एक दूसरे के साथ छल नहीं करने की शिक्षा दी गई है

पद्य कथा दो ठग

पद्य कथा दो ठग

रामनगर का गाँव रहा था
किसी समय वैभवशाली,
वहीं बसा फिर श्यामनगर भी
काट जगह जंगल वाली।। १।।

दया धर्म का पालन करते
इन गाँवों के रहवासी,
खुश रहते थे अपने ही में
खा रूखा सूखा बासी।। २।।

किन्तु अन्न के दानों में भी
मिल जाते जैसे कंकर,
वैसे ही भोले लोगों में
छुप जाते हैं ठग आकर।। ३।।

खरी कमाई को लोगों की
कभी लूट ये ठग लेते,
भोले जन हाथों को मलते
दोष भाग्य को हैं देते।। ४।।

ऐसे ही दो ठग आए थे
इन दो गाँवों के हिस्से,
जिनकी चालाकी के प्रचलित
दूर दूर तक थे किस्से।। ५।।

छगन रह रहा रामनगर में
श्यामनगर में मगन बसा,
शीश वही धुनकर रह जाता
जो भी इनके जाल फँसा।६।।

सीधे लोगों को ठग लेना
काम बहुत हो सरल भले,
हँसी फूटती लेकिन जब ठग
इक दूजे को कभी छले।। ७।।

तो फिर बच्चों सुनो कहानी
ऐसी ही इक ठग वाली,
चतुर बने दोनों ही ठग के
हाथ रहे जिसमें खाली।। ८।।

इन गाँवों में कुछ दूरी पर
हाट एक देखा लगते,
जहाँ पहुँच कर छगन मगन भी
लोगों को रहते ठगते।। ९।।

दोनों की रोजी चलती थी
इस ठग विद्या के बूते,
कभी कभी पकड़े जाते तो
खा भी लेते थे जूते।। १०।।

फिर भी लोगों को ठगने की
गई नहीं उनकी आदत,
सचमुच मुश्किल से है जाती
एक बार जो पड़ती लत।। ११।।

छगन एक दिन बैठा घर में
गहरी चिन्ता में डूबा,
नहीं समझ पर कुछ भी आता
सोच सोच कर वह ऊबा।। १२।।

हाट मनोहरपुर में कल को
लगने वाला है भारी,
किन्तु अभी तक हुई नहीं है
मेरी कुछ भी तैयारी।।१३।।

हफ्ता भर के खर्चे की अब
कैसे होगी भरपाई,
किन्तु छगन को तभी अचानक
एक युक्ति दी दिखलाई।। १४।।

उछल पड़ा था छगन खुशी से
खत्म हुई चिन्ता सारी,
बनना होगा मुझे हाट में
कल घी का ही व्यापारी।। १५।।

लगा छगन मटकी में भरने
ठूँस ठूँसकर तब गोबर,
फैलाया घी ऊपर जिससे
गोबर आए नहीं नजर।। १६।।

ऐसे घी की मटकी को ले
छगन हाट की ओर चला,
सोच रहा था – देखें अबकी
जाता मुझसे कौन छला।। १७।।

उधर मगन भी सोच रहा था
भाग्य मुझे ही क्यों छलता,
बहुत दिनों से ठग विद्या का
खास नहीं धन्धा चलता।। १८।।

चौकन्ने अब लोग हो गए
पड़ा काम मेरा ठंडा,
अगर हाट मैं कल जाऊँ तो
अपनाऊँ क्या हथकंडा।। १९।।

जोर बुद्धि पर जब डाला तो
उसे ध्यान कुछ यूँ आया,
घर में म्यान पड़ी है टूटी
जिस पर जाला है छाया।। २०।।

क्या होगा तलवार बिना पर
म्यान अकेली से खाली,
कहीं नहीं देखी है बजती
एक हाथ से तो ताली।। २१।।

तभी तरीका एक अनौखा
उसको जल्दी से सूझा,
टूटी – फूटी ले वह लकड़ी
तलवार बनाने जूझा।। २२।।

रंग चढ़ा कर चांदी जैसा
म्यान मगन ने चमकाई,
तलवार बनी पीली लकड़ी
देती सोने की झाँई।। २३।।

चला हाट को अकड़ दिखाता
शीश गर्व से ऊँचा कर,
कसी हुई तलवार कमर में
किन्तु समाया मन में डर।। २४।।

पार गाँव के जब वह पहुँचा
वहीं छगन आ टकराया,
अभिवादन में फिर दोनों का
कुछ-कुछ मुखड़ा मुस्काया।। २५।।

कहा छगन ने – सता रहा है
किसका भय तुमको भाई,
यह तलवार बगल में तुमने
किस कारण से लटकाई।। २६।।

कहा मगन ने क्या बतलाऊँ
अपनी बात तुम्हें भैया,
महँगाई में डोल रही है
अब डगमग घर की नैया।। २७।।

मेरी यह तलवार पुरानी
सात धातुओं से निर्मित,
आज बेचने इसे जा रहा
निर्धनता से हो शापित।। २८।।

खैर सुनाओ अब तुम अपनी
सिर पर यह कैसी मटकी,
इससे आती खुशबू में तो
मेरी साँसें भी अटकी।। २९।।

बोला छगन – अरे मेरी है
घी की एक दुकान बड़ी,
इस मन्दी के कठिन दौर में
किन्तु आजकल बन्द पड़ी।। ३०।।

घूम घूम कर अब तो घी को
मुझे बेचना है पड़ता,
तब जाकर घर की गाड़ी का
पहिया कुछ आगे बढ़ता।। ३१।।

इसे बेचकर घर की चीजें
आज मुझे थी ले जानी,
किन्तु देख यह म्यान तुम्हारी
लेने की मैंने ठानी।। ३२।।

भाँप गया वह चतुर छगन भी
उत्सुक यह लगता घी का,
ले ले यह पूरी मटकी तो
दूर हटे कंटक जी का।। ३३।।

आगे की फिर बात चलाई
उन दोनों ने बैठ वहीं,
सोच रहे थे सच्चाई की
लग जाए ना भनक कहीं।। ३४।।

दोनों ही ठग सोच रहे थे
हो जल्दी से सौदा तय,
खुल जाए ना राज ठगी का
सता रहा दोनों को भय।। ३५।।

कहा छगन ने – यह लो मटकी
स्वाद शुद्ध घी का चखना,
जब तक घी खाओ तब तक तो
भैया याद मुझे रखना।। ३६।।

मगन कहाँ चुप रहने वाला
बोला – उत्साहित होकर,
तलवार म्यान दोनों देंगे
साथ तुम्हारा जीवन भर।। ३७।।

चोर नहीं कोई तकता है
जब घर में तलवार रहे,
जो रखता तलवार पास में
दुनिया उसको वीर कहे।। ३८।।

फिर क्या था दोनों ने अपनी
झटपट चीज बदल डाली,
मगन ले चला घी की मटकी
म्यान छगन ने संभाली।। ३९।।

दोनों मन ही मन खुश होते
अपने को देते शाबाशी,
जल्दी में वे छुपी बात की
ले पाए नहीं तलाशी।। ४०।।

घर आया था छगन ऐंठता
अपनी छाती को ताने,
देख बँधी तलवार बगल में
आँखें लगती मुस्काने।। ४१।।

जब पत्नी के सम्मुख आया
मूँछों पर था ताव दिया,
बोला – आज भाग्य से मैंने
कितना सुन्दर काम किया।। ४२।।

नहीं किसी की हिम्मत होगी
आँख दिखाए जो हमको,
अब पड़ौस में डरने की भी
नहीं जरूरत है तुमको।। ४३।।

ऐसा कह तलवार निकाली
लगा उसे था तब धक्का,
रंग चढ़ी लकड़ी देखी तो
खड़ा रहा हक्का बक्का।। ४४।।

पत्नी के तो हँसते हँसते
लगे पेट में पड़ने बल,
बोली – चतुर बने फिरते हो
आज हुआ पर तुमसे छल।। ४५।।

उधर मगन लम्बे डग भरता
घर की ओर बढ़ा जाता,
हाथ लगा था मटकी भर घी
यही खुशी मन में पाता।। ४६।।

सोचा – पत्नी के कुछ दिन में
होने वाला है बच्चा,
घी के लड्डू खाएगी तो
नहीं रहेगा तन कच्चा।। ४७।।

लगा रसोई घर में करने
वह लड्डू की तैयारी,
घी कड़ाह में पूर रहा था
उठा मगन मटकी भारी।। ४८।।

पर यह क्या थोड़ी – सी गिरकर
घी की धार लगी थमने,
और इसी के साथ मगन की
साँस लगी जैसे जमने।। ४९।।

चिन्ताग्रस्त मगन ने देखा
मटकी को फिर सीधी कर,
घी तो कबका बीत चुका था
बचा हुआ था बस गोबर।। ५०।।

बैठा था पत्नी के आगे
मुँह अपना वह लटकाए,
तर्क सफाई में अब क्या दे
नहीं समझ कुछ भी आए।। ५१।।

जो बनता था बड़ा धुरन्धर
आज मात उसने खाई,
लोभी मन खा बैठा धोखा
काम न चालाकी आई।। ५२।।

इस प्रकार दोनों ही ठग अब
घर में बैठे पछताते,
घटना ही यह कुछ ऐसी थी
क्या औरों को बतलाते।। ५३।।

बच्चों ! ठगना किसी और को
अच्छी बात नहीं होती,
इससे इज्जत खोकर मानव
होता ज्यों फूटा मोती।। ५४।।

जो औरों से छल करता है
चैन उसे कब मिल पाता,
इस दुनिया में वही सुखी है
जो श्रम की रोटी खाता।। ५५।।

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