हँसी पर दोहे – हँसी केवल चेहरे की मुस्कान नहीं, बल्कि आत्मा की वह मधुर ध्वनि है जो जीवन के हर अंधकार को उजाले में बदल देती है। कभी शिशु की किलकारी बनकर, कभी प्रेम की मूक भाषा बनकर, तो कभी हास्य की मुक्त धारा बनकर हँसी मनुष्य के जीवन को सौंदर्य और आनंद से भर देती है।
प्रस्तुत दोहों की यह श्रृंखला हँसी के विविध रूपों का अत्यंत मार्मिक, सजीव और काव्यमय चित्रण करती है। इन दोहों में हँसी की निश्छलता, मधुरता, व्यंग्य, प्रेम और अट्टहास जैसे अनेक भावों को बड़ी सरलता और गहराई से व्यक्त किया गया है। यह रचना न केवल हृदय को स्पर्श करती है, बल्कि जीवन में हँसी के महत्व को भी समझाती है।
आइए, इन सुंदर दोहों के माध्यम से हँसी के इन अद्भुत रंगों का रसास्वादन करें।
हँसी पर दोहे

रूप हँसी के हैं विविध, अलग अनेकों ढंग।
जलतरंग जैसी , कहीं , बजता लगे मृदंग।।
किलकारी मधुरम मधुर, शिशु की हँसी अनूप।
निश्छल, पावन, मोहिनी , झलके ईश्वर रूप।।
मुँह को खोले ही बिना , हँसी करे आवाज़।
होठों के ताले कहें , सबका करो लिहाज़।।
खनक भरी कमसिन हँसी,हास्य कला चातुर्य।
कानों में वह घोलती , शहदीला माधुर्य।।
मधुर हँसी माहौल में , चार लगाती चाँद।
बोझिलता सिर पाँव रख, भागे अवसर फाँद।।
खी-खी करती जब हँसी , गिने चुने हों दाँत।
पेट पकड़ हँसते सभी , दुखने लगती आँत।।
मुक्त कण्ठ हो हास्य, दे, तन-मन को आह्लाद।
आकर्षित हों लोग भी, लेने लगते स्वाद।।
तिरछी चितवन में हँसे , अक्सर ही उपहास।
पर खेलें प्रेमी युगल , चुपके – चुपके रास।।
मज़ेदार जब बात हो , नहीं हँसी पर ज़ोर।
अंग- अंग हँसने लगे , हर्ष अश्रु दृग कोर।।
बिना नाद की इक हँसी, जिसका ओर न छोर।
होंठों सहित कपोल- मुख, थामे रहते डोर।।
दर्प, कुटिलता से भरा , अट्टहास का रूप।
देख विपद आसन्न को , आतंकित नर- भूप।।
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यह दोहे हमें भेजे हैं आदरणीया सुधा राठौर जी ने नागपुर, महाराष्ट्र से।
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