गणतंत्र दिवस की कविता :- लोकतंत्र की है जो पहचान

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गणतंत्र दिवस की कविता

गणतंत्र दिवस की कविता

देश की खातिर जिसने अपना सब कुछ वार दिया
उन वीरों का देश ने बढ़कर नित आभार किया
खिलते रहे देश में ऐसे ही सुगंधित फूल
जीवन को जिसने वतन पर निस्वार्थ एक करार दिया ।।

इन वीरों ने आगे बढ़कर गोली सीने में खाई थी।
आजादी की खातिर इसने तन मन से लड़ी लड़ाई थी।
उन वीरों को नमन देश का
जिसने जान की बाजी लगाई थी।।

आज मेरे देश में फिर 26 जनवरी आई है।
भारत में खुशियाँ आज अपार ये लाई है।
ये दिवस कुछ ख़ास है आज
इसने कोरोना काल में जग की करी अगुवाई है

देश भक्ति का पीकर जिन्होंने जाम।
रच दिया संविधान उन्हें सलाम।
सबको समानता का दिया अधिकार
उन भीमराव को शत शत प्रणाम।।

लगे दो वर्ष ग्यारह माह अठारह दिन।
किये प्रारूप समिति ने कार्य भिन्न भिन्न।
तब जाकर बना भारत का संविधान
समानता,न्याय,बन्धुता जिसके अधीन।।

देश में लोकतंत्र की है जो पहचान।
सम्पूर्ण देश की बसी जिसमें जान।
देता सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक न्याय
कहलाता विश्व का सबसे बड़ा संविधान।।

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रचनाकार का परिचय

अरविन्द कालमा

यह कविता हमें भेजी है अरविन्द कालमा जी ने भादरुणा (साँचोर), राजस्थान से।

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