गृहिणी पर कविता :- आसान कहाँ था गृहिणी होना

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घर को स्वर्ग बनाने वाली गृहिणी पर कविता :-

गृहिणी पर कविता

गृहिणी पर कविता

चलती कलम छोड़ झाडू घसीटना,
दूध की मलाई खाना छोड़
मक्खन के लिये बचत करना,
दुपट्टे से उम्र के सम्बंध जोड़ना
कभी साड़ी में घसीटना।

कभी चुनरी खीसकने से संभालना,
किताबें छोड़, गृहस्थी पढ़ना,
एक एक फुल्का गोल सेंकना
सहेलियाँ छोड़, दीवारों से बात करना।

चुप रहना, मस्तियाँ भुला
बड़ी होने का ढोंग करना,
झुमकियों से कानों का बोझ मरना
घूंघट में खुद को गुनहगार समझना।

पीला रंग उड़ा कर
तुम्हारी पसंद पहनना,
हाथ की घड़ी उतार
खनकती चूडियाँ पहनना।

पायलों का पैरों में चुभना
कपड़ों के साथ सपने निचौड़
धूप में सुखाना,
रोज सुबह जल्दी उठना
अपनी फिक्र छोड़
सबकी सुनना।

मैथ के सवाल करते करते
अचानक दूध के हिसाब करना
इतना आसान कहाँ था
गृहिणी होना ।।

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