हिंदी कविता बलात्कार | Hindi Kavita Balatkar

प्रस्तुत है चारू मित्तल जी द्वारा रचित हिंदी कविता बलात्कार :-

हिंदी कविता बलात्कार

हिंदी कविता बलात्कार

ना जानी ना समझी,
कुसूर मेरा,
अपराध मेरा,
मै तो थी मासूम कली।
अपनी डाल पे मैं खिली।।

कुछ सपने सतरंगी से,
जो धनक मे भिगोते से थे।
कुछ ख्वाब अधपके से,
जो गालो पे लाली संजोते से थे।।

अभी तो ना मोहब्बत समझी,
ना चाहत को जाना  था।
सतरंगी सी जिंदगी के,
ना रंगो को पहचाना था।।

क्यूँ कुछ सिरफिरो ने,
मेरा जीवन यूं तार तार किया।
मेरे उजले यौवन को,
मेरे पाक दामन को,
दागदार किया।।

गलत ना थी,
फिर भी क्यूँ मैं शर्मसार हुई।
जमाने को दू सफाई,
दू पाकदामनी की दुहाई,
ये मेरी कहानी नहीं,
बलात्कार से जूझी,
हर लड़की इस कैफ़ीयत
से दो चार हुई।

बलात्कार तो हुआ एक बार,
पर बेकसूर होके भी,
बदनाम वो कई बार हुई।
बदनाम वो हर बार हुयी।।

पढ़िए :- नारी सशक्तिकरण पर कविता “उठो नारियों वक़्त आ गया”


रचनाकार कर परिचय

चारू मित्तल

यह कविता हमें भेजी है चारू मित्तल जी ने मथुरा, उत्तर प्रदेश से।

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