हिंदी कविता : भोग | यह भोग क्या | Hindi Kavita Bhog

आप पढ़ रहे हैं पंकज कुमार द्वारा रचित हिंदी कविता : भोग :-

हिंदी कविता : भोग

हिंदी कविता : भोग

यह भोग क्या
है सोच क्या?
संयोग नास्तिक
है रोग क्या?

जीवंत शाखा टूटती
सममूल ही तोड़ती,
अधर्म नाता है हुआ
कालिख मुंह में पोतती।

सत्य का निष्पक्ष पुजारी
कैसे दुर्बल हुआ,
अहिंसा का मनुरागी
कैसे वासना वासी हुआ।

अस्तित्व न है
आकार न है,
व्यस्तता का
संस्कार न है।

तू बना था भगवन
लेकिन,
तूने ही पूजा तोड़ दी
परन्तु,

जीव जीवों में लगे
न दिखे फिर वासना,
भंगूर माया मिटे
अमृत्व चरित्र का पालना।

वस्तु वस्तु का दमन
निज शान से नहीं,
तू बनेगा अविलासी
तुच्छ है श्वान से नहीं।

पढ़िए :- हिंदी कविता “कम्पन्न”


पंकज कुमार यह रचना हमें भेजी है पंकज कुमार जी ने कोरारी गिरधर शाह पूरे महादेवन का पुरवा, अमेठी से

“ हिंदी कविता : भोग ” के बारे में कृपया अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। जिससे रचनाकार का हौसला और सम्मान बढ़ाया जा सके और हमें उनकी और रचनाएँ पढ़ने का मौका मिले।

यदि आप भी रखते हैं लिखने का हुनर और चाहते हैं कि आपकी रचनाएँ हमारे ब्लॉग के जरिये लोगों तक पहुंचे तो लिख भेजिए अपनी रचनाएँ hindipyala@gmail.com पर या फिर हमारे व्हाट्सएप्प नंबर 9115672434 पर।

हम करेंगे आपकी प्रतिभाओं का सम्मान और देंगे आपको एक नया मंच।

धन्यवाद।

 

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published.