हिंदी कविता – दरिद्रता | यह कैसी दरिद्रता

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हिंदी कविता – दरिद्रता

हिंदी कविता - दरिद्रता

यह कैसी दरिद्रता?
मानव स्तब्ध
उदर रिक्त
अचंभा जेब का
पड़ा सूखा पत्ता,
कैसा ईश्वरकृत।

संतान ईश्वर की
भाग्य खाली,
यह कैसी प्रीत
लपटने को चीथड़ा कंबल,
निद्रा पूरी कैसे
जब मौसम शीत।

अषाढ़ की महिमा निराली
दीवार ढह रही,
रसोइयाँ जलकृत
ध्वनि प्रचंड मेघ की,
बच्चे आंचल में छुपते
ममता माया एवं सूत।

चिंघाड़ती रात्रि का समापन
उजड़ा है संसार,
घरौंदा कैसे नवनीत?
दास बनकर जीना मुझे
स्वामी मेरे सरकार
है विधि पुनीत।


दीपक भारतीयह रचना हमें भेजी है दीपक भारती जी ने कोरारी गिरधर शाह पूरे महादेवन का पुरवा, अमेठी से

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