हिंदी कविता वफादार मनकू | ब्राह्मणी और नेवला पंचतंत्र पद्य कथा

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पंचतंत्र की कहानी ब्राह्मणी और नेवला की कविता रूप में प्रस्तुति हिंदी कविता वफादार मनकू में :-

हिंदी कविता वफादार मनकू

हिंदी कविता वफादार मनकू

बहुत समय पहले रहता था
एक गाँव में पंडित,
राजसभा में अपने गुण से
था वह महिमा – मंडित। १।

गुजर रहा था एक बार वह
जब जंगल से होकर,
बैठ गया था पेड़ तले तब
खा पत्थर की ठोकर। २।

कुछ आहट – सी सुन पंडित ने
पीछे नजर घुमाई,
तभी नेवले का इक बच्चा
उसको दिया दिखाई। ३।

पड़ी हुई थी वहीं पास में
बच्चे की मृत माता,
प्रसव – समय ही टूट गया था
उसका शिशु से नाता। ४।

देख दृश्य यह उस पंडित की
आँखें थी भर आई,
सोचा – अब बच्चे की होगी
कैसे पेट भराई। ५।

यहाँ रहा तो ऐसे ही यह
भूखों मर जाएगा,
या आ कोई हिंसक प्राणी
अभी इसे खाएगा। ६।

नहीं ! नहीं ! मैं इसको ऐसे
कभी न मरने दूँगा,
इसे उठाकर घर ले जाऊँ
वहीं इसे पालूँगा। ७।

फिर वह पंडित उस बच्चे को
अपने घर ले आया,
पास बुला अपनी पत्नी को
धीरे से समझाया। ८।

अरी ! देख यह बच्चा कितना
भोला भाला प्यारा,
पैदा होते माँ खो बैठा
यह किस्मत का मारा। ९।

पंडित ने अपनी पत्नी से
पूरी कही कहानी,
बोला – अबसे हमीं करेंगे
इसका दाना पानी। १०।

मनकू नाम रखेंगे इसका
अब यह यहीं रहेगा,
साथ साथ अपने मुन्ने के
यह भी पले – बढ़ेगा। ११।

पत्नी बोली – वन्यजीव यह
नहीं भरोसा इसका,
उसे न घर में रखना अच्छा
पता न कुछ भी जिसका। १२।

मुन्ने के हित ठीक नहीं है
इसका घर में रहना,
छोड़ इसे जंगल में आओ
मेरा है यह कहना। १३।

पंडित बोला – अरे प्यार से
ये अपने हो जाते,
उसका साथ सदा देते हैं
जिसका भी ये खाते। १४।

मुन्ने को तो मनकू अपना
भाई ही मानेगा,
संकट में भी यह मुन्ने पर
आँच न आने देगा। १५।

लगा नेवले का वह बच्चा
पंडित के घर रहने,
उछलकूद से उसकी घर का
आँगन लगा विहँसने। १६।

पंडित की पत्नी रखती पर
मुन्ना सदा बचाकर,
काट कहीं ना खाए मनकू
उसे सताता यह डर। १७।

एक बार पंडित की पत्नी
गई नदी जल भरने,
पंडित से बोली आने तक
घर पर ही को रहने। १८।

पंडित ने सोचा किस्मत ने
कैसा किया छलावा,
अरे आज तो राजा का था
पूजा हेतु बुलावा। १९।

निकला ही जाता मुहुर्त है
मुझको जल्दी जाना,
धन पाने का ऐसा अवसर
अच्छा नहीं गँवाना। २०।

चला गया पंडित भी घर से
यथाशीघ्र ही बाहर,
मुन्ने की रक्षा करने को
वह मनकू बैठाकर। २१।

इसी बीच आ गया कहीं से
काला साँप भयंकर,
मुन्ने को डसने का उपजा
अब मनकू के मन डर। २२।

साँप बढ़ा जैसे ही आगे
मनकू मन में दहला,
लेकिन शीघ्र किया मनकू ने
दुश्मन पर जा हमला। २३।

साँप नेवले में फिर जमकर
होने लगी लड़ाई,
और अंत में मनकू ने ही
विजय साँप पर पाई। २४।

किए साँप के टुकड़े – टुकड़े
मनकू ने कर घायल,
मुन्ने पर आया संकट भी
इसके साथ गया टल। २५।

वफादार मनकू जा बैठा
दरवाजे के बाहर,
था प्रसन्न वह आज बहुत ही
अपना फर्ज निभाकर। २६।

पंडित की पत्नी जैसे ही
पानी भरकर आई,
देख खून से लथपथ मनकू
वह अतिशय घबराई। २७।

वह समझी इसने मुन्ने को
आज मार ही डाला,
अरे ! इसे तो मैंने अपने
बच्चे – सा था पाला। २८।

होश गँवा बैठी थी अपना
वह पंडित की पत्नी,
सोचा – कैसी हाय जान पर
मुन्ने की आज बनी। २९।

क्रोधित हो उसने पानी की
तब भरी हुई मटकी,
बड़े प्यार से पूँछ हिलाते
मनकू के सिर पटकी। ३०।

तड़प उठा मनकू बेचारा
गिर धरती के ऊपर,
कातर होकर देखी स्वामिन
और गया फिर वह मर। ३१।

पंडित की पत्नी जैसे ही
पहुँची घर के भीतर,
मरा पड़ा देखा तब उसने
काला साँप वहाँ पर।३२।

यह भी देखा ठीक तरह है
उसका मुन्ना बेटा,
अपने से ही खेल रहा है
वह झूले में लेटा। ३३।

पता भूल का चला उसे तो
बड़े जोर से रोई,
मनकू का उपकार याद कर
अपनी सुध-बुध खोई। ३४।

जल्दबाजी में बच्चों तुम
काम कभी ना करना,
कहीं पड़े ना हमें बाद में
पछताना भी वरना। ३५।

काम सोचकर करने वाले
कभी नहीं पछताते,
सुख से जीवन यापन करते
और सफलता पाते। ३६।

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