कागज कलम की तकरार कविता :- जब कलम ने बोला कागज से

+2

कागज कलम की तकरार कविता ( Kagaz Kalam Ki Takraar Kavita ) – जहाँ प्यार होता है वहां तकरार भी हो ही जाती है। फिर रूठना-मनाना भी होता है। ऐसा होता है तो इंसानों के बीच। लेकिन एक कलम और कागज में कैसे तकरार हो सकती है आइये पढ़ते हैं :-

कागज कलम की तकरार कविता

कागज कलम की तकरार कविता

जब कलम ने बोला कागज से
तू मेरे वश में रहता है
जो कुछ लिख दूँ तेरे ऊपर तू
उसी बात को कहता है।

गुस्सा खाकर कागज़ बोला
मैं नहीं हूँ तेरे दबाड़े में,
मैं रहूँ सुरक्षित बहुत दिनों
तू जल्दी फिके कबाड़े में।

ये समझ बहादुरी मेरी
अपनी पीठ पर तुझे झुलाता हूँ,
एक आदमी की बातों को
दूजे तक पहुंचाता हूँ।

सुनकर कागज की बातें
फिर कलम उसे है समझाती,
मैं न होती तो इस दुनिया में
तो कीमत तेरी घाट जाती।

इसलिए यार गुस्सा छोड़ो
अब मिलकर दोनों काम करें,
समय-समय पर इस दुनिया में
अपना ओना नाम करें।

जीवन का लक्ष्य है प्रेम भाव
झगड़ा फसाद तकरार नहीं,
वो जीवन भी क्या जीवन है
जिसमें थोडा प्यार नहीं।

पढ़िए :- शिक्षा और शिक्षक पर कविता “शिक्षा ही जीवन का आधार है”


रनवीर सिंहयह रचना हमें भेजी है रनवीर सिंह जी ने ग्राम जऊपुरा, सिकंदरा, आगरा से

“ कागज कलम की तकरार कविता ” ( Kagaz Kalam Ki Takraar Kavita ) के बारे में कृपया अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। जिससे रचनाकार का हौसला और सम्मान बढ़ाया जा सके और हमें उनकी और रचनाएँ पढ़ने का मौका मिले।

यदि आप भी रखते हैं लिखने का हुनर और चाहते हैं कि आपकी रचनाएँ हमारे ब्लॉग के जरिये लोगों तक पहुंचे तो लिख भेजिए अपनी रचनाएँ hindipyala@gmail.com पर या फिर हमारे व्हाट्सएप्प नंबर 9115672434 पर।

हम करेंगे आपकी प्रतिभाओं का सम्मान और देंगे आपको एक नया मंच।

+2
Share on whatsapp
WhatsApp
Share on telegram
Telegram
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on email
Email

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *