किसान पर कविता :- किसान का दर्द बताती कविता

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हर मौसम में बिना किसी छुट्टी के काम करने वाले किसान पर कविता :-

किसान पर कविता

किसान पर कविता

ज्येठ की सुलगती अग्नि में हल लगाने को मजबूर हुआ,
प्रताड़ित होकर आपदाओं से, स्वखुशियों से ही दूर हुआ।

खून पसीना बहा-बहाकर,जो एक-एक पाई जुटाता है,
फिर चुकाने कुछ सूत-ब्याज, वह निराश मजदूर हुआ।

गंवाकर अपना सबकुछ उसने, खेती पर ही ध्यान दिया,
अच्छी फसल न होने पर भी, बस उसका ही कसूर हुआ।

वर्षा,ओला,शिशिर,सहकर, फसलों का था ख्याल रखा,
नष्ट हुई फसलों से फिर, किसान को बड़ा नासूर हुआ।

पालता अपनी औलादों सा, सींचता अपनी ममता से,
उत्तम,उन्नत पैदावार ही, किसान के चेहरे का नूर हुआ।

ईश नहीं, ईशान नहीं, कोई शेष बचा न किसानों का,
जिसे मिले प्रजा शाशन, वह कुर्सी लोभ में चूर हुआ।

खाने को तैयार सभी, पर खेती करने से दूर भाग रहे,
मेरे देश की धरती गाकर कोई, चुनाव में मशहूर हुआ।

गाँव के सारे खेत छोड़कर, शहरों को रुख मोड़ दिया,
हार मानकर हालातों से, फिर पलायन का दस्तूर हुआ।

विकास की दौड़ में ऐसे दौड़े, आधार अपना भूल बैठे,
कृषि प्रधान देश में कृषक, आत्महत्या को मजबूर हुआ।

पढ़िए :- किसान का दर्द कविता “एक किसान कल”


हरीश चमोली

मेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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