त्याग पर कविता :- छल द्वेष दंभ त्याग कर | Tyag Par Kavita

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बुरी आदतों का त्याग कर ईमानदारी से जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करती ( Tyag Par Kavita ) त्याग पर कविता “छल द्वेष दंभ त्याग कर” :-

त्याग पर कविता

त्याग पर कविता

आया है जो इस जग में
इंसान बन के जी ।
छल द्वेष दंभ त्याग कर
ईमान बन के जी ।

नेकी की राह चल सदा
होकर बदी से दूर ।
बन जायेगा फिर एक दिन
हर आँख का तू नूर ।
हिंदु की गीता मुस्लिम के
कुरान बन के जी ।।
छल द्वेष दंभ त्याग के
ईमान बन के जी ।।

आया है जो इस जग में
जायेगा एक दिन ।
कर्म जो बुरे हो तो
रूलायेगा एक दिन ।
त्याग तपस्या अपना
कर गुणगान बन के जी ।
छल द्वेष दंभ त्याग के
ईमान बन के जी ।।

ये जग है माया नगरी
सब छोड़ जायेगा ।
शहजादी मौत की आयेगी
तू सबको रूलायेगा ।
अपनों के बीच में तू
मेहमान बन के जी ।
छल द्वेष दंभ त्याग के
ईमान बन के जी ।
ईमान बन के जी ।

पढ़िए :- कर्म पर हिंदी कविता “कर्मयुद्ध के भीषण रण में”


रचनाकार का परिचय :-

श्रीमती केवरा यदु " मीरा "यह कविता हमें भेजी है श्रीमती केवरा यदु ” मीरा “ जी ने। जो राजिम (छतीसगढ़) जिला गरियाबंद की रहने वाली हैं। उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें इस तरह हैं :-
1- 1997 राजीवलोचन भजनांजली
2- 2015 में सुन ले जिया के मोर बात ।
3-2016 देवी गीत भाग 1
4- 2016 देवीगीत भाग 2
5 – 2016 शक्ति चालीसा
6-2016 होली गीत
7-2017  साझा संकलन आपकी ही परछाई।2017
8- 2018 साझा संकलन ( नई उड़ान )

इसके अतिरिक्त इनकी अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हें इनकी रचनाओं के लिए लगभग 50 बार सम्मानित किया जा चुका है। इन्हें वूमन आवाज का सम्मान भी भोपाल से मिल चुका है।
लेखन विधा – गीत, गजल, भजन, सायली- दोहा, छंद, हाइकु पिरामिड-विधा।
उल्लेखनीय- समाज सेवा बेटियों को प्रशिक्षित करना बचाव हेतु । महिलाओं को न्याय दिलाने हेतु मदद गरीबों की सेवा।

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