अध्यापक पर कविता :- गुमराह समाज | Adhyapak Par Kavita

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अध्यापक पर कविता

अध्यापक पर कविता

समाज भूल गया आज रास्ता, मंजिल कहीं और है,
चला कहीं और जाता है,
कारण भी स्पष्ट है कि अध्यापक की
कद्र करना इसे कदापि नहीं आता है।

पहले भगवान का दर्जा था,
गुरू कह कर पुकारा जाता था,
मां बाप से भी पहले
गुरू को सत्कारा जाता था,

आधुनिक युग में समाज बदला,
इसकी सोच बदली,
और अध्यापक को बना डाला
समाज की कठपुतली,

परीक्षा केन्द्र में छात्र द्वारा
इसे हथियार दिखाया जाता है,
समाज भूल गया आज रास्ता, मंजिल कहीं और है,
चला कहीं और जाता है।

आम दिनों में भी ये
छात्रों द्वारा धमकाया जाता है,
बाप के रुतबे का, चाचा की पुलिसिया वर्दी का
डर दिखाया जाता है,
कक्षा में गैरहाजिर रहने वाले विद्यार्थी को
सही राह दिखाने पर,
मन्त्री मामा और वकील फूफा से
फोन करवाया जाता है,

और कभी कभी तो गिफ्ट और
नोटों का लालच दिलाया जाता है,
समाज भूल गया आज रास्ता, मंजिल कहीं और है,
चला कहीं और जाता है।

पहले लोगों के लिए खुदा था,
पीर था अध्यापक,
अंधेरी राह में दिया था,
दियासलाई था अध्यापक,
पहले ज्ञान का भंडार था,
ज्ञान ही बांटता था,
अब मरदमशुमारी में है,
पोलियो ड्राप बांटता है अध्यापक,

विरोध करे तो अपने ही पढ़ाए
पुलिस वाले की लाठी खाता है,
समाज भूल गया आज रास्ता, मंजिल कहीं और है,
चला कहीं और जाता है।


डा. गुरमीत सिंहडा. गुरमीत सिंह खालसा कालेज, पटियाला ( पंजाब ) से गणित विषय में प्राध्यापक के पद आसीन हैं। आप मर्यादित और संजीदा भाव के धनी होने के साथ-साथ आप गुणीजनों और प्रबुद्धजीवी में से एक हैं। आप अपने जीवन के अति व्यस्ततम समय मे से कुछ वक्त निकाल कर, गीत और सँगीत के शौक के साथ रेख्ता, शेर-ओ-शायरी को अवश्य देते हैं। आपकी गणित विषय पर 25 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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