ग़ज़ल – फ़सादी कहानी हैं | Ghazal Fasaadi Kahani Hai

आप पढ़ रहे हैं आदरणीया कविता सिंह “वफ़ा” जी द्वारा रचित ( Ghazal Fasaadi Kahani Hai Akhbaar Me ) ग़ज़ल – फ़सादी कहानी हैं अख़बार में :-

ग़ज़ल – फ़सादी कहानी हैं

ग़ज़ल :- फ़सादी कहानी हैं

फ़सादी कहानी हैं अख़बार में !
यही बिक रहा आज बाज़ार में !!

ज़मीं ता फ़लक़ शाम गहरा गई ,
रहा मुंतज़र दिल तो इक़रार में !

ज़मीं आसमां आज ग़मगीन हैं ,
लुटी बेटियाँ देख संसार में !

हिमायत भी थी रहनुमाई भी थी ,
अलग कुछ दिखा उसके व्यवहार में !

ख़ता क्या हुई बद गुमाँ जो हुआ ,
कि अब के नहीं वो है ग़मख़्वार में !

बचा ले ओ मौला सफ़ीना मेरा ,
फंसी मेरी कश्ती है मँझदार में !

‘वफ़ा’ के तलबग़ार अब हैं कहाँ ,
सुख़नवर ही कहते हैं अशआर में !

पढ़िए :- वक़्त पर शायरी , स्टेटस और कोट्स


रचनाकार का परिचय

कविता सिंह वफ़ा

यह ग़ज़ल हमें भेजी है आदरणीया कविता सिंह जी ने। आप एक सामान्य गृहणी हैं। आप हिंदी विषय में परास्नातक हैं और ग़ज़ल , कविताएँ , मुक्तक , कतअ , दोहा गीत आदि लिखने में रूचि रखती हैं। अनेकों साझा संकलन और पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं को स्थान मिला।

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ग़ज़ल तर्क वितर्क

ग़ज़ल तर्क वितर्क | Ghazal Tark Vitark

ग़ज़ल तर्क वितर्क मुश्क़िलों को समझें तर्क – वितर्क करें , मज़हबों में नहीं सोच में फ़र्क़ करें।

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