हिंदी दिवस पर हास्य कविता :- हिंदी बहुत निराली है | Hindi Diwas Par Hasya Kavita

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हिंदी भाषा का महत्त्व बताती हरीश चमोली जी की बेहतरीन रचना ( Hindi Diwas Par Hasya Kavita ) हिंदी दिवस पर हास्य कविता “हिंदी बहुत निराली है”

हिंदी दिवस पर हास्य कविता

हिंदी दिवस पर हास्य कविता

हिंदी लगती मस्त निराली।
घर में लाती है उजियाली।
कौवा, तोता, कबूतर,मोर।
हिंदी में ही मचाओ शोर।
ये दिल मांगे थोड़ा और।
पप्पू का था जीजा चोर।

भिंडी,गाजर, खाओ मूली।
चढ़ी विदेशी, भाषा सूली।
सोनू खाये, नमक ककड़ी।
हिंदी देती, सबको लंगड़ी।
कद्दू, लौकी,खाओ भिंडी।
आपस में सब बोलो हिंदी।

आम,संतरा और अनार।
हिंदी हमें देती सुविचार।
गजरा,कंगन,चूड़ी,बिंदी।
भाषाओं का साज हिंदी।
आलू,प्याज,तोरी,टिन्डी।
दादा जी की प्यारी हिंदी।

राम खाता,रोटी अचार।
सब करो, हिंदी से प्यार।
पौष्टिक ही खाना आहार।
हिंदी सिखाती शिष्टाचार।
वासुदेव थे मथुरा में बंदी।
थी कंस की बोली हिंदी।

लोमड़ी खाती खट्टे अंगूर।
बंदर सा ही, लगता लंगूर।
भोलेनाथ का वाहन नंदी।
करें सवारी, बोलके हिंदी।
जो जग में होते हैं चिन्दी।
उनको भी भाती है हिंदी।

हुई राम सुग्रीब में संधि।
बनी गांधारी माता अंधी।
गंजे नहीं करते हैं कंघी।
हमें लगती सच्ची हिंदी।
मीन रहे जल में जिन्दी।
भाषाओं की रानी हिंदी।

खाओ मीठी शकरकंदी।
हनुमान की पूंछ थी लंबी।
कैकेई की मंथरा थी गंदी।
आम को ही कहते अम्बि।
होती हवा पेड़ों की ठंडी।
जग में अमर रहेगी हिंदी।

पढ़िए :- हिंदी भाषा के महत्व पर कविता “हिंदी को ही भूल गया है”


हरीश चमोली

मेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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