माँ बिन कैसे जी पाऊंगा :- माँ की याद में कविता

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माँ बिन कैसे जी पाऊंगा

माँ बिन कैसे जी पाऊंगा

जन्म से लेकर ही,धरा पर तेरे,
आँचल की छाँव, में रोया था।
मेरे नैन खुले भी,नहीं थे किंतु,
तेरे आभास,मात्र से सोया था।
गुरु बन पहली, आयी सामने,
मुझे शब्द- रस पिलाया था।
तुतलाती जुबाँ पर, प्रथम मेरे,
माँ तेरा ही,नाम तो आया था।

मुझे सुलाने की, खातिर तू माँ,
रात- रात भर पूरी जगती थी।
हल्की सी, ध्वनि सुनकर मेरी,
तू झटपट से, फिर उठती थी।
कितनी तकलीफ सही तूने है,
बस मेरे सुकून की खातिर माँ।
मुझे सुलाने की, खातिर तू माँ,
मुझे लेकर गोदी में,घूमती थी।

बस तेरे आँचल,में मुझको माँ,
स्वर्ग सा जींवन, मिलता था।
बस तेरे होने, मात्र से ही मेरे,
इस चेहरे का,नूर खिलता था।
अनुपम सुख भी,पाता था मैं,
तू मेरा सिर जब सहलाती थी।
मेरी चेहरे पे,मुश्कान देखकर,
माँ अपने गम, भूल जाती थी।

बिस्तर गीला, होने पर मेरा
तू खुद गीले में सो जाती थी।
सूखे बिस्तर पर रख मुझको
लोरियाँ सुनाकर,सुलाती थी।
यह भी तेरा, एक कर्ज है माँ,
जो मरकर भी न चुका पाऊं।
कोशिश जीतेजी यही करूँगा
तुझे दुःख नहीं कोई पहुंचाऊं।

मैं करता हूँ इक, वादा तुझसे।
तुझे छोड़ कहीं न जाऊंगा मैं।
फिर माँ-बेटे के,बीच कभी भी,
प्रियतम को नहीं लाऊंगा मैं।
मैं प्रियतम का साथ निभाऊँगा,
किन्तु माँ से दूरी न बढ़ाऊंगा।
माँ के सुख की खातिर मैं फिर,
प्रियतम को सदा समझाऊंगा।

माँ तू केवल इक, शब्द नहीं है।
जिसे कभी,भूल मैं जाऊंगा माँ।
जीवंत उदाहरण, देवी का तू है,
तुझे छोड़ नहीं, जी पाऊंगा माँ।
प्रियतम के संग,रहते हुए भी मैं,
तुझे खुशी सदा,दे सकता हूँ माँ।
सजनी बिन तो जी लूँगा किन्तु,
तुझ बिन कैसे, जी पाऊंगा माँ।

याद है माँ,मुझको सब कैसे तू?
सारी गलतियाँ मेरी छुपाती थी।
पापा की डाँट से,सदा ही तू माँ,
मुझको कैसे फिर, बचाती थी।
दे ईश्वर मुझे,आशीष इतना कि,
मैं माँ के लिए कुछ, कर पाऊं।
इस जन्म में ही,उसका मैं फिर,
अच्छा सा राजा,बेटा बन पाऊँ।

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रचनाकार का परिचय

हरीश चमोली

मेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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