हिंदी कविता अजनबी बनकर | Hindi Kavita Ajnabi Bankar

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आप पढ़ रहे हैं हिंदी कविता अजनबी बनकर :-

हिंदी कविता अजनबी बनकर

हिंदी कविता अजनबी बनकर

अजनबी बनकर ही सही कुछ देर ठहर जाते
होठ ख़ामोश ही सही ख़ामोश रहकर ही कुछ कह जाते ।

दिल को मिली काश ए हंसी सौगात होती
तुम कुछ देर और ठहर जाते तो कुछ और बात होती ।

बरसती बारिश की बूंदों संग महकती खुशबू गुलाब की होती ।
तुम कुछ देर और ठहर ….

अधर जब कुछ कह नहीं पाते
तो आंखो से सही मगर कुछ बात तो होती ।

तुम कुछ देर और ठहर जाते तो कुछ और बात होती ।
तुम हो मुसाफिर अगर हम मान लेते तो
आंखो से आंसू की ये बरसात न होती ।
तुम कुछ देर और ठहर ….

चाहतों का अपना अलग ही अंदाज है
वर्ना गम व खुशियों से भरी ये जिन्दगी इतनी बिंदास न होती ।
मिलाकर यूं कदम से कदम जो न हटाते
तो मेरी भी आंखो में कुछ और बात होती ।
तुम कुछ देर और ठहर जाते तो कुछ और बात होती ।


रचनाकार कर परिचय :-

अवस्थी कल्पनानाम – अवस्थी कल्पना
पता – इंद्रलोक हाइड्रिल कॉलोनी , कृष्णा नगर , लखनऊ
शिक्षा – एम. ए . बीएड . एम. एड

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