हिंदी कविता खूब हूँ रोया | Kavita Khoob Hun Roya

आप पढ़ रहे हैं हिंदी कविता खूब हूँ रोया :-

हिंदी कविता खूब हूँ रोया

हिंदी कविता खूब हूँ रोया

उसकी काली जुल्फो के साये में
रहने का मन करता है
दिल कितना भी रूठ जाए ,,
पर उसे सुनने का संग करता है

हाथों की बनी चाय फिर से
पीने का मन करता है
मुड़कर देखा वो वहीं खड़ी है ,,,
उसको गले लगा कर
रोने का मन करता है

आंखे कितनी भी नम हो उसकी,,,,,
उसे खुश देखने का मन करता है
बैठक होती थी कभी उस सूरज के साथ
अब तो वो सनसेट भी बेरंग लगता है

बस अब तो याद है उसकी सिर्फ बाते ,,,
कहती मत करो इतनी तारीफे जनाब
क्योंक ढलती चांदनी में ये चांद भी ढलता है
ठहर तो जाता उस वक्त को लेके ,,,

जिस पल मै सोया था..
दिल में आंच नहीं ज्वाला थी.
उस पल खूब हूं रोया……
धड़कन को एक बार तो सुनती
जिस पल तुमको है खोया था……

पढ़िए :- प्यार पर कविता | प्यार की राह में | Pyar Par Kavita


रचनाकार का परिचय

अनुपम गुप्तायह कविता हमें भेजी है अनुपम गुप्ता जी ने कानपुर नगर, उत्तर प्रदेश से।

“ हिंदी कविता खूब हूँ रोया ” ( Hindi Kavita Khoob Hun Roya ) के बारे में कृपया अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। जिससे रचनाकार का हौसला और सम्मान बढ़ाया जा सके और हमें उनकी और रचनाएँ पढ़ने का मौका मिले।

यदि आप भी रखते हैं लिखने का हुनर और चाहते हैं कि आपकी रचनाएँ हमारे ब्लॉग के जरिये लोगों तक पहुंचे तो लिख भेजिए अपनी रचनाएँ hindipyala@gmail.com पर या फिर हमारे व्हाट्सएप्प नंबर 9115672434 पर।

हम करेंगे आपकी प्रतिभाओं का सम्मान और देंगे आपको एक नया मंच।

धन्यवाद।

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on telegram
Telegram
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on email
Email

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *