मन पर कविता :- मन की चाह | Man Ke Upar Kavita Hindi Mein

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मन पर कविता

मन पर कविता

मन क्यों चंचल इच्छा अनंत,
खोजे किसको हर क्षण हर पल।
संतोष नहीं ना शांत कहीं,
किसको पाने का रहता विकल।।

यह रंग रंगीली है दुनिया,
होता रहता नित नया यहां
है सार जगत का प्रेम-प्रसंग।
मन क्यों चंचल इच्छा अनंत ।।

सुख क्षणिक हुआ, जब मिला एक,
फिर आया मन में,मिल जाए अनेक
न मात -पिता, न भाई-बहन,
सब महत्वहीन,न लगे अहम,

क्या खाऊं पीऊं पाऊं,जग में,
क्यों बढ़े लालसा रग रग में, ,
मन की चाहत हो उठे ज्वलंत।
मन क्यों चंचल इच्छा अनंत।।

यह रहस्य अलौकिक है मन की,
न बड़ी वस्तु दौलत धन की,
इच्छा को कौन समझ पाया?
भरपाई इसका कर पाया,

करता विचरण मन मतंग।
मन क्यों चंचल इच्छा अनंत।।
मन ढूंढ रहा है परमानंद,
कागज के फूल में कहां गंध,

आनंद खोज के पागल पथिक
मन को न कर इतना व्यथित,
जिस दिन होगा ईश्वर से मिलन,
सुख शांति करेंगे आलिंगन

तब अनंत चाह का होगा अंत।
मन क्यों चंचल इच्छा अनंत।।

पढ़िए :- कविता मन की खुशियाँ


रचनाकार का परिचय

रामबृक्ष कुमार

यह कविता हमें भेजी है रामबृक्ष कुमार जी ने अम्बेडकर नगर से।

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