पति पत्नी पर हास्य कविता :- कभी बेलन चलाती है | Pati Patni Hasya Kavita

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पति पत्नी पर हास्य कविता ( Pati Patni Hasya Kavita ) आधारित है ऐसे पति-पत्नी पर जिसमें पति पत्नी से परेशान है। जो लोग शादी के सपने देखते रहते हैं उनके लिए एक उपदेश जैसी है यह शादी पर हास्य कविता । कैसे? आइये पढ़ते हैं इस कविता में:-

पति पत्नी पर हास्य कविता

पति पत्नी पर हास्य कविता

कभी बेलन चलाती है, कभी बर्तन पटकती है,
हमारी हर खुशी उनकी, आँखों में खटकती है।

सुबह से शाम तक का मैं अभी किस्सा सुनाता हूँ,
मैं अपनी दिनचर्या का कुछ हिस्सा सुनाता हूँ।

कुँवारे जो भी अब तक हैं, प्लानिंग आज कर लेना,
मूसल देख लो पहले, फिर ओखल में तुम सर देना।

सुबह उठता हूँ धीमे से, न उनकी नींद खुल जाए,
बनाता हूँ चाय ऐसे, कहीं बर्तन न खड़क जाए।

डर के काँपते हाथों से, फिर उनको जगाता हूँ,
चाय रेडी है देवी जी, धीरे से बताता हूँ।

तोड़ दी नींद क्यूँ मेरी, ये कह आँखें दिखाती है,
छीन कर हाथ से प्याला, वो फिर चुस्की लगाती है।

खड़े हो तुम अभी तक क्यों, झाड़ू कौन लगाएगा?
है आया की भी छुट्टी आज, पोंछा कौन लगाएगा?

कर के बिस्तर, झाड़ू और पोंछा बर्तन धोता हूँ,
थक के चूर हो जैसे ही थोड़ा सीधा होता हूँ।

कि वो आती है दौड़ी सी, और झिड़की लगाती है
किया है काम सब गड़बड़, ये अब मुझको बताती है।

हटो मैं खुद ही कर लूंगी, तुम्हें खाना बनाना है,
बदल के पप्पू का डाईपर, उसे हार्लिक्स पिलाना है।

ये सारे काम निपटा कर, उन्हें नाश्ता कराता हूँ
न कोई नुक्स अब निकले ये ईश्वर से मनाता हूँ।

खाना दोपहर का फ्रिज में वो खुद ही रखती है
जो थोड़ा छोड़ देती है, उसी को मैं चबाता हूँ।

टिफिन खाली रह जाए, तो भी ले कर जाता हूँ
शाम को दो समोसे और चटनी, ले के आता हूँ।

खुश करने को उनको, प्यार से झट पकड़ाता हूँ,

मगर वो देखते ही मुझ पे, कुछ ऐसे चिल्लाती है।
सारा आसमां ही वो, अपने सर उठाती है।

घर में हैं नहीं पैसे, ये सब क्यों कर लाते हो।
बचत मैं जितना करती हूँ,फूटानी में उड़ाते हो।

खा के डाँट भी उनकी, खुशी ही मैं जताता हूँ
दाँते बाहर कर के मैं, थोड़ा मुस्कुराता हूँ।

हँसे हो देख के मुझको, या यूँहीं मुस्कुराए हो
कहो किस कलमुँही के तुम चक्कर में आए हो?

बता देती हूँ ज्यादा दूर तक जो फड़फड़ाओगे
डैने तोड़ दूँगी बस, यहीं पे छटपटाओगे

बना के जल्दी से खाना, टेबल पे लगा देना
मैं खा लुँगी खुद से ही, तुम पप्पू को खिला देना

थोड़ा बच गया किस्सा है वो भी मैं बताता हूँ।
खुद सोने से पहले रोज उनके पाँव दबाता हूँ।

अगर जो हाथ रुक जाए, तो फिर मत पूछ ऐ यारों।

ऐसे पाँव चलाती है, मेरी पसली चटकती है।
कभी बेलन चलाती है, कभी बर्तन पटकती है।

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विनय कुमार (भूतपूर्व सैनिक )यह कविता हमें भेजी है विनय कुमार (भूतपूर्व सैनिक ) जी ने बैंगलोर से।

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