“तेज़ी से बदलती आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को सुविधा तो दी, पर साथ ही छीन लिए उसके स्वाभाविक व्यायाम, शारीरिक अनुशासन, और पारंपरिक जीवन मूल्य। आज की यह रचना स्वास्थ्य पर दोहे—आलस्य, गलत आदतों और अंधाधुंध आधुनिकरण के कारण उभरते रोगों को उजागर करती है। यह दोहे केवल शब्द नहीं, बल्कि एक चेतावनी है, एक दर्पण है— जो हमें हमारा ही बदला हुआ रूप दिखाती है। आइए, स्वास्थ्य, संस्कृति और जीवन-चर्या पर आधारित इस मार्मिक स्वास्थ्य पर दोहे श्रृंखला को पढ़ते हैं।

स्वास्थ्य पर दोहे

स्वास्थ्य पर दोहे

१ )
मार पालथी बैठना , आदत दी जब छोड़।
स्वास्थ्य कुपित लेने लगा , इक दुर्दैवी मोड़।।

२ )
घुटने , पंजे , पिंडलियाँ , देने लगे जवाब।
रखा उपेक्षित जब उन्हें , बचा न उनमें ताब।।

३ )
घुटने मोड़े ना मुड़ें , लगा जोड़ में जंग।
दूभर चलना – बैठना , पीड़ा करती तंग।।

४ )
महिमा साइकिल की घटी, छूट गया व्यायाम।
अस्थि- संधि की लोच ने , पाया पूर्ण विराम।।

५ )
सिल- बट्टा, चक्की दुखी , छूट गया मैदान।
चूल्हा भी पदच्युत हुआ , मूसल है हैरान।।

६ )
खड़े- खड़े भोजन पका , झुकने का ना काम।
खड़े- खड़े भोजन किया, कमर हुई निष्काम।।

७ )
शनैः शनैः तब रीढ़ में , बढ़ते चले विकार।
डॉक्टर के चक्कर लगें , फिर भी नहीं सुधार।।

८ )
शौचालय में पश्चिमी , हैं कमोड सिरमौर।
उकड़ूं आसन था उचित , बीत गया वह दौर।।

९ )
मूत्ररोग सह कब्ज़ के , लगे पसरने पाँव।
औषधि सेवन के सिवा , बचा न कोई ठाँव।।

१० )
चंगुल आलस का सबल,ज्यों अजगर का बंध।
तोड़े निष्क्रिय मनुज के , देह- हाड़ अनुबंध।।

११ )
छूटे श्रम के कार्य तो , नहीं स्वेद की धार।
शुगर निभाए मित्रता , रक्तचाप सरकार।।

१२ )
जीवन – चर्या आधुनिक , दस्तक देते रोग।
वेतन आधे से अधिक , का चढ़ जाता भोग।।

१३ )
सेहत से खिलवाड़ का , भोग रहे हम दंश।
मगर न चेतें इन्द्रियाँ , फला रोग का वंश।।

१४ )
सेहत कहती है परख , कौन शत्रु या मित्र।
आँख खोल परिणाम के , देखो चित्र विचित्र।।

१५ )
संस्कृति की अवमानना,कुण्ठित करती सोच।
अंध-अनुकरण, बुद्धि में, कहीं न ला दे मोच।।

पढ़िए :- पेड़ पर दोहे | Ped Par Dohe | Dohe On Tree


यह दोहे हमें भेजे हैं आदरणीया सुधा राठौर जी ने नागपुर, महाराष्ट्र से।

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